तालिबान के कब्ज़े के बाद आज एक बार फिर अफ़गानिस्तान में उथल-पुथल मची है. दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका 20 सालों तक अफ़गानिस्तान में रहने के बाद भी शांति स्थापित नहीं कर सका.अफ़गानों पर नियंत्रण और शासन करना हमेशा से मुश्किल रहा है. मगर भारत में एक महान योद्धा ऐसा भी हुआ है, जिसका नाम सुनकर एक समय अफ़गान भी कांप उठते थे. इस योद्धा का नाम था हरि सिंह नलवा (Hari Singh Nalwa).

Sardar Hari Singh Nalwa
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हरि सिंह नलवा के नाम का ऐसा ख़ौफ़ अफ़गानों में फैला था कि उस वक़्त अफ़गान माएं भी अपने रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए उनका नाम लिया करती थीं. 

महाराज रणजीत सिंह कमांडर थे हरि सिंह नालवा

हरि सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह की सेना में सबसे भरोसेमंद कमांडरों में से एक थे. वो कश्मीर, हजारा और पेशावर के राज्यपाल थे. उन्होंने न सिर्फ़ अफ़गानों को बुरी तरह शिकस्त दीं, बल्कि उन्हें पंजाब में दाख़िल होने से भी रोका. उन्होंने खैबर दर्रे में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था. दरअसल, 1000 ईसवी से 19वीं सदी की शुरुआत तक विदेशी आक्रमणकारी खैबर दर्रे से ही भारत में घुसपैठ करते थे.

Indian Express ने गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर के वाइस चांसलर डॉ. डीपी सिंह के हवाले से बताया कि अफग़ान लोक कथाओं में इस बात का ज़िक्र आता है कि जब कोई बच्चा बहुत शोर-शराबा करता था, तो उसकी मां उसे चुप कराने के लिए नलवा का नाम लेती थी. उनका नाम सुनकर ही रोता बच्चा शांत होकर बैठ जाता था.

Great Sikh Warrior
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डॉ सिंह ने आगे कहा कि ये नलवा था, जिसने अफग़ानिस्तान सीमा और खैबर दर्रे के साथ कई क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया, जिससे अफग़ानों को उत्तर-पश्चिमी सीमा में प्रवेश करने से रोका जा सका. दरअसल, अफ़ग़ानों की दिल्ली और पंजाब में बार-बार होने वाली घुसपैठ को रोकने के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने दो तरह की सेनाएं बनाई थीं. एक जिसमें फ़्रांसीसी, जर्मन, इतालवी, रूसी और यूनानी सैनिकों को नियुक्त किया गया, जिनके पास आधुनिक हथियार थे. वहीं, दूसरी सेना का ज़िम्मा हरि सिंह नलवा को सौंपा, जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की ही प्रजाति हजारा के 1000 लड़कों को को हराया था. वो भी तब जब नलवा की सिख सेना, हजारा से तीन गुना कम थी. भारत सरकार ने भी साल 2013 में उनकी बहादुरी को समर्पित एक डाक टिकट जारी किया था.

कई बार अफ़ग़ानियों को दी शिकस्त

हरि सिंह नलवा ने कई बार अफ़ग़ानियों को युद्ध के मैदान में धूल चटाई. साल 1807 में नलवा ने कसूर की लड़ाई में अफ़गानी शासक कुतब-उद-दीन ख़ान को हराया. उस वक़्त नलवा की उम्र महज़ 16 वर्ष थी. वहीं, 1813 में अटक की लड़ाई में नलवा ने अन्य कमांडरों के साथ अजीम ख़ान और उसके भाई दोस्त मोहम्मद ख़ान के खिलाफ़ जीत हासिल की. ये दोनों काबुल के शाह महमूद की ओर से लड़े थे. साथ ही, ये दुर्रानी पठानों पर सिखों की पहली बड़ी जीत थी.

Sikh warrior
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बाद में, 1818 में,नलवा के अधीन एक सिख सेना ने पेशावर की लड़ाई जीती. इसके अलावा, उन्होंने 1837 में जमरूद पर अधिकार कर लिया, जो खैबर दर्रे के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान के प्रवेश द्वार पर एक किला था. इतना ही नहीं, मुल्तान, हजारा, मानेकेरा और कश्मीर में लड़ी गई लड़ाइयों में भी सिख सेना ने अफ़गानों को शिकस्त दी थी. एक के बाद एक नलवा के नेतृत्व में सिख सेना की जीत ने अफ़ग़ानों के दिल में ख़ौफ़ भर दिया था.

मरने के बाद भी बना रहा हरि सिंह नलवा के नाम का ख़ौफ़

जमरूद की लड़ाई में हरि सिंह नलवा बुरी तरह घायल हो गए थे. मगर उन्होंने अपनी सेना को साफ़ आदेश दिया था कि उनकी मौत की ख़बर अफ़ग़ानों तक न पहुंचे. दरअसल, नलवा का नाम ही अफ़गानियों में ख़ौफ़ भरता था. ऐसे में उन्होंने कहा जब तक लाहौर से सेना नहीं आ जाती, तब तक उसकी मौत की खबर न बताई जाए. 

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कहते हैं कि हरी सिंह नलवा ने ये युद्ध न जीते होते तो, पेशावर और उत्तरी-पश्चिमी इलाका आज अफ़गानियों के कब्ज़ें में होता. ऐसे में पंजाब और दिल्ली में अफ़गानी घुसपैठ का डर हमेशा बना रहता.