अंग्रेज़ों ने भारत में क़रीब 200 सालों तक राज किया. 1750 के दशक में अंग्रेज़ भारत में कदम रखने के लिए मचल रहे थे. इस दौरान अंग्रेज़ों को एक ऐसे साथी की ज़रूरत थी जो इसमें उनकी मदद कर सके. ऐसे में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला (Siraj ud-Daulah) के सेनापति मीर जाफ़र (Mir Jafar) ने नवाब को धोखा देकर अंग्रेज़ों को भारत में पैर जमाने का मौका दिया.

सिराजुद्दौला

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2 जुलाई 1757 का वो दिन था, जब नवाब सिराजुदौला को गद्दार सेनापति मीर जाफ़र की धोखाधड़ी की क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी. मीर जाफ़र का ये वही जगत प्रसिद्ध धोखा था जिसकी वजह से पीढ़ियों तक लोग अपने बच्चों का नाम मीर जाफ़र रखने से भी कतराते थे. आज भी गद्दारी और नमकहरामी का प्रतीक है ये नाम.

 मीर जाफ़र

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मीर जाफ़र ही वो शख़्स था जो 'प्लासी के युद्ध' में रोबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया था क्योंकि क्लाइव ने उसे बंगाल का नवाब बनाने का लालच दिया था. मीर जाफ़र हमेशा से ही बंगाल का नवाब बनने का सपना देखता था. आख़िरकार सिराजुद्दौला की मौत के बाद वो अंग्रेज़ों की मदद से बंगाल का नवाब बन गया. वो ब्रिटिश साम्राज्य में बंगाल राज्य का पहला नवाब था. मीर जाफ़र 1757 से 1760 तक बंगाल का नवाब रहा.  

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इस घटना को भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना की शुरुआत भी माना जाता है. आगे चलकर मीर जाफ़र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप में 'देशद्रोही' व 'ग़द्दार' का पर्यायवाची बन गया. और इसी को भारतीय इतिहास में Great Betryal (महान विश्वाशघात) के नाम से भी जाना जाता है. 

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सन 1760 में मीर जाफ़र के संबंध अंग्रेज़ों से ख़राब हो गए थे. अंग्रेज़ों से तंग आकर मीर जाफ़र ने 'बंगाल के नवाब' की गद्दी छोड़ तक छोड़ दी थी. इसके बाद उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की गद्दी पर बैठाया गया. मगर जब उसने भी अंग्रेजो से दगा किया तब जुलाई 1763 अंग्रेज़ों ने फिर से मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया. 1765 में मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद कलकता कौंसिल ने उनके दूसरे बेटे निजमुद्यौला को बंगाल का नवाब बना दिया, जिससे पूरे राज में अराजकता फ़ैल गयी. 

मीर जाफ़र ने धोखे से जीता नवाब का दिल 

मीर जाफ़र 1740 के दशक में बंगाल के नवाब अलीवर्दी ख़ान का विश्वास जीतने के लिए उनके यहां बख्शी के पद पर कार्य करने लगा. लेकिन कुछ ही समय में उसने एक साहसी सैनिक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की और नवाब के सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाने लगा. 'कटक के युद्ध' में मीर जाफ़र ने न सिर्फ़ नवाब अलीवर्दी ख़ान के भतीजे शौलत जंग को बचाया, बल्कि वो मराठाओं को हराने में भी सफ़ल रहा.

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इसके बाद मीर जाफ़र बंगाल के नवाब अलीवर्दी ख़ान का ख़ास बन गया. लेकिन 'मेदिनीपुर के युद्ध' में मराठाओं की सैन्य शक्ति देखकर वहां से भागने पर नवाब अलीवर्दी ख़ान को मीर जाफ़र की कायरता का पता चल गया. इसके बाद मीर जाफ़र ने नवाब को मारने के लिए अताउल्लाह के साथ एक साजिश रची, लेकिन साजिश का पता लगने पर उसे उसके पद से बर्खास्त कर दिया गया. ऐसा होने पर भी मीर जाफ़र ने अपने मंसूबों को नहीं बदला.

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नवाब अलीवर्दी के बाद उनके पोते सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर बैठे. इसके बाद मीर जाफ़र ने फिर से बंगाल पर आक्रमण करने के लिए शौकत के साथ जंग की साजिश रची. हालांकि, इस साजिश का पता सिराजुद्दौला को चल गया और उन्होंने उसे पद से हटा दिया. सन 1756 में सिराजुद्दौला, अंग्रेज़ों से कासिमबाज़ार कारखाने को जीतकर कलकत्ता (कोलकाता) की तरफ़ बढ़े, लेकिन ब्रिटिशों ने जल्द ही जवाबी कार्रवाई की और सिराज को मुर्शिदाबाद की तरफ़ भागने के लिए मजबूर कर दिया.

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अंग्रेज़ों ने जब मीर जाफ़र से सहायता मांगी तो वो ख़ुशी-ख़ुशी इसके लिए राजी हो गया. इस दौरान मीर ज़ाफ़र ने अंग्रेज़ों के साथ गुप्त रूप से एक समझौता कर लिया था कि उसे सिराजुद्दौला के बदले बंगाल का नवाब बनाया जाए. मीर ज़ाफ़र की इस मांग पर अंग्रेज़ों ने भी हामी भर दी क्योंकि उन्हें तो पूरे भारत पर सत्ता चाहिए थे. 

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इसके बाद रॉबर्ट क्लाइव के अधीन ब्रिटिश सेना ने मुर्शिदाबाद पर चढ़ाई की और वर्ष 1757 में प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की सेना ने मीर के साथ मिलकर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को ही धोखा दे दिया. इस युद्ध में सिराजुद्दौला मारा गया और मीर जाफ़र बंगाल, बिहार और उड़ीसा का नया नवाब बन गया.