लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) 9 जून 1964 को जवाहर लाल नेहरू के बाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री चुने गए थे. हालांकि, सन 1964 में जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद गुलज़ारी लाल नंदा 13 दिन के लिए भारत के अस्थायी प्रधानमंत्री बनाए गये थे. इसके बाद 1966 लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद गुलज़ारी लाल नंदा फिर से 13 दिन के लिए देश के अस्थायी प्रधानमंत्री बने थे.

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पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी लगभग 18 महीने भारत के प्रधानमंत्री रहे थे, अपने छोटे से कार्यकाल में 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी, जिसका ज़ख्म आज तक पाकिस्तान नहीं भूला है. पाकिस्तान की हार से परेशान होकर अमरीका ने भारत को गेहूं देने से इंकार कर दिया था, जबकि उस समय भारत में अनाज कमी थी. इसके बाद शास्त्री जी ने रेडियो के माध्यम से देश की जनता से सप्ताह में 1 दिन व्रत रखने की अपील की.

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शास्त्री जी ये फ़ैसला लेने से पहले अपनी पत्नी ललिता शास्त्री से बोले कि 'मैं देश की जनता से सप्ताह में 1 दिन व्रत रखने की अपील करने जा रहा हूं, क्या तुम और हमारे बच्चे इस नियम का पालन करेंगे? इस पर ललिता शास्त्री ने जवाब दिया आप निश्चिंत होकर देश की जनता से अपील करें, मैं और मेरे बच्चे आप की अपील का पालन करने के लिए सदैव तत्पर रहेंगे'.

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इसके बाद शास्त्री जी ने देश की जनता से सप्ताह में 1 दिन व्रत रखने की अपील की. देश की जनता ने भी उनकी ये अपील भी ख़ुशी मान ली. इस दौरान उन्होंने देश को 'जय जवान, जय किसान' का नारा देते हुए खाली जगहों पर भी खेती करने की सलाह दी. शास्त्री जी के इस आह्वान के कुछ समय बाद ही देश में अनाज का संकट तो ख़त्म हो गया लेकिन वो सप्ताह में 1 दिन व्रत रखने वाले नियम का पालन अपने आख़िरी वक़्त तक करते रहे.

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अब आते हैं मुद्दे की बात पर

लाल बहादुर शास्त्री बेहद साधारण ज़िंदगी जीना पसंद करते थे. शास्त्री जी जब देश के प्रधानमंत्री थे तब उनके पास न तो ख़ुद का घर था, न ही उनके पास अपनी कोई गाड़ी थी. लेकिन शास्त्री जी ठहरे पक्के वसूलों वाले शख़्स. वो अपने वसूलों के आगे कभी झुके नहीं. प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया. वो चाहते तो उनके पास 1 नहीं, बल्कि दसियों घर होते.

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एक बार लाल बहादुर शास्त्री जी के बच्चों ने उनसे कहा कि अब वो भारत के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए अब उनके पास भी ख़ुद की एक कार होनी चाहिए. शास्त्री जी ने भी बच्चों के कहने पर कार ख़रीदने का मन बनाया. सन 1960 के दशक में फ़िएट कार की क़ीमत 12,000 रुपये के क़रीब हुआ करती थी. उस ज़माने के हिसाब से ये एक बड़ी रकम थी. किसी भी देश के प्रधानमंत्री के लिए कार ख़रीदना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन शास्त्री जी के पास कार ख़रीदने के लिए पर्याप्त पैसे ही नहीं थे.

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बैंक खाते में थे सिर्फ़ 7,000 रुपये

इसके शास्त्री जी ने अपने सचिव से कहा कि, ज़रा देखें तो उनके बैंक खाते में कितने रुपये हैं? जब सचिव ने देखा तो शास्त्री जी के बैंक खाते में उस वक्त केवल 7,000 रुपये पड़े हुए थे. शास्त्री जी अपने बच्चों को मायूस नहीं देखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बाकी के पैसे बैंक से लोन लेने का फैसला किया. इसके बाद उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार ख़रीदने के लिए 5,000 रुपये का लोन ले लिया.

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शास्त्री जी की पत्नी ने ठुकराई लोन माफ़ी की पेशकश

1 साल बाद लोन चुकाने से पहले ही लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया. शास्त्री जी के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने सरकार की तरफ़ से लोन माफ़ करने की पेशकश की गई थी, लेकिन शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने इसे स्वीकार नहीं किया और उनकी मौत के 4 साल बाद तक अपनी पेंशन से उस लोन को चुकाया. 

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बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री जी की ये कार आज भी दिल्ली के 'लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल' में रखी हुई है. देश भर से हर साल हज़ारों लोग इस ऐतिहासिक कार को देखने आते हैं.