Parijaat Tree: भारत में पारिजात वृक्ष को बेहद पवित्र माना जाता है. हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बेहद महत्व है. इसके फूलों का प्रयोग भगवान हरि के श्रृंगार और पूजन में किया जाता है. इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को 'हरसिंगार' के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि पारिजात वृक्ष की छाया में बैठने और इसे छूने मात्र से ही सारी थकावट दूर हो जाती है.

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पारिजात को हरसिंगार, रात की रानी, शेफ़ाली, शिउली आदि नामों से भी जाना जाता है. इसका वानस्पतिक नाम 'निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस' (Nyctanthes Arbortristis) है. अंग्रेज़ी में इसे 'नाइट जैस्मीन' कहते हैं. इस वृक्ष की सबसे ख़ास बात ये है कि इसमें बड़ी संख्या में फूल लगने के चलते ये दिखने में बेहद ख़ूबसूरत होता है. पारिजात वृक्ष की ऊंचाई 10 से 25 फ़ीट तक होती है.

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आइए इस दिव्य वृक्ष के बारे में कुछ ख़ास बातें जान लेते हैं-

पारिजात के फूल की एक और ख़ास बात ये है कि ये केवल रात में ही खिलता है और सुबह होते ही इसके सारे फूल झड़ जाते हैं. इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है. पारिजात (हरसिंगार) का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है. दुनिया में इसकी केवल पांच प्रजातियां ही पाई जाती हैं. इस पेड़ से आप एक दिन में चाहे कितने भी फूल क्यों न तोड़ लें, लेकिन रातों-रात इसमें फिर से बड़ी मात्रा में फूल खिल जाते हैं.  

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औषधीय गुणों से भरपूर

पारिजात वृक्ष अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है. इसके बीज के सेवन से बवासीर रोग ठीक हो जाता है. पारिजात के फूलों के रस के सेवन से हृदय रोग से बचा जा सकता है. इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर खाने से सूखी खांसी भी ठीक हो जाती है. पारिजात की पत्तियों से त्वचा संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं. इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोग भी ठीक हो जाते हैं. 

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पौराणिक कथाओं के मुताबिक़, 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर सीता माता 'हर‍सिंगार' के फूलों से ही अपना श्रृंगार किया करती थीं. हरिवंश पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष भी कहा गया है. इस फूल को लेकर ये मान्यता भी है कि स्वर्गलोक में इसको स्पर्श करने का अधिकार केवल उर्वशी नाम की अप्सरा को ही था. इस वृक्ष के स्पर्श मात्र से ही उर्वशी की सारी थकान मिट जाती थी.  

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हिंदू धर्म में मान्यता है कि, धन की देवी लक्ष्मी जी को पारिजात के फूल अत्यंत प्रिय हैं. पूजा-पाठ के दौरान मां लक्ष्मी को ये फूल चढ़ाने से वो प्रसन्न होती हैं. भारत में पूजा-पाठ के दौरान पारिजात के वही फूल इस्तेमाल किए जाते हैं, जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं. पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है.  

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मान्यता है कि परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में लगाया था. ये भी कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने पारिजात पुष्प से शिव पूजन करने की इच्छा जाहिर की थी. माता की इच्छा पूरी करने के लिए अर्जुन ने स्वर्ग से इस वृक्ष को लाकर यहां स्थापित किया था. तभी से इस वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती है. 

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उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में महाभारतकालीन एक पारिजात वृक्ष है, जो क़रीब 45 फ़ीट ऊंचा है.

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