कहत फ़कीर सुनो भई साधो!

ऐसा कलयुग आएगा, अख़बार में हैडलाइन छपेगी, पढ़ के बड़ा मज़ा आएगा

कवि यहां पर ये कहना चाहते हैं कि पाठकों को अख़बारों में लिखी गयी हैडलाइन्स ध्यान दे कर पढ़ने की ज़रूरत है, क्योंकि इनमें इतनी कॉमेडी होती है, जो शायद लोगों को कॉमेडी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट में न मिले. किसी भी अख़बार का काम लोगों तक ख़बर पहुंचाना होता है. ये काम काफ़ी सीरियस काम है और ये काफ़ी हद पत्रकार और उसके एडिटर की ज़िम्मेदारी समझी जाती है. लेकिन कई बार घटनाएं इतनी मज़ेदार (यहां दुर्भाग्यपूर्ण इस्तेमाल करना चाहिए) होती हैं कि पत्रकार भी भावुक हो जाते हैं. भावुकता की नदी में बहते-बहते पत्रकार ऐसी-ऐसी हैडलाइंस लिख डालते हैं, जो अच्छे-अच्छे कॉमेडियंस को मात दे दे.

चलिए आपको मिलवाते हैं अख़बार और टीवी में छपी कुछ ऐसी ही ज़बरदस्त हैडलाइन्स से:

अच्छा? 

इनको सच में ज़्यादा ठंड लग रही थी.

ये आदमी गंदा बोल रहा है! 

क्या? क्या? क्या? 

भाई को ज़्यादा प्रॉब्लम जीन्स-टॉप से थी.

समझ गए कौन सा चैनल है? 

अंधा हुआ प्यार, भावुक हुआ पत्रकार.

मौका-मौका

ये गंदे जोक से भी गंदा है! 

सबसे अविश्वसनीय हैडलाइन.

फिर से Guess करो, कौन सा चैनल? 

ये पक्का बॉस की खुंदक निकाली है.

यार ये सच में राष्ट्रिय मुद्दा है.

नहीं... वो इतना किराया नहीं दे पाएगा.

कम्बल दे आये उन्हें? 

मोगैम्बो ख़ुश हुआ...

ये हैडलाइन भी लगता है ड्रैगनफ्लाई ने ही लिखी है. 

अच्छा तो है...

गंदी लड़की

उस लड़की ने वो गाना गाया होगा, 'तू दिलादे मेनू गोल्डन झुमके'...

शायद वो चटनी लेने गए हों.

आज कुछ तूफ़ानी लिखते हैं.

हाय... हाय...

 ये तो बहुत बड़ी समस्या है! 

हा. हा. हा.

बेचारा!

टांय... टांय... Face

इनसे शायद ग़लती से मिस्टेक हो गया.

It Happens Only In India!