भारत अवॉर्ड शो का देश है. यहां नाना प्रकार के अवॉर्ड शो होते हैं. अवॉर्ड शो का एक मौसम आता हैं, जिसमें ट्रॉफ़ियां उगती हैं और सबकी झोली में गिरती हैं.

अभी एक दो दिन पहले मैं IIFA देख रहा था. आधा घंटा देखने के बाद मेरे दिमाग़ में चलने लगा कि ये ख़त्म क्यों नहीं हो रहा? आधा घंटा और देखने के बाद सवाल फिर से उठा, ये सारे अवॉर्ड शो ही क्यों ख़त्म नहीं हो जाते.

मैं बताता हूं ऐसा क्यों होना चाहिए...

ज़्यादातर अवॉर्ड शो सिर्फ़ पैसों के लिए होते हैं

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कोई भी अवॉर्ड शो उठा कर देख लीजिए, तीन घंटे के अवॉर्ड शो में एंकर द्वारा उसके स्पॉन्सर्स के नाम को हटा दें, तो वो घट कर डेढ़ घंटे का हो जाएगा. इसके अलावा मिनट-मिनटमें आने वाले एड और उनका सदियों तक चलना उफ्फफफ... इसके अलावा ये भी आरोप लगते रहते हैं कि इनमें अवार्ड बिकते भी हैं. आरोप सच हो चुके हैं... तो ये बोलने में शर्म में कोई शर्म भी नहीं. 

कलाकारों ने भी इसका बहिष्कार करना शुरू कर दिया है

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कई बड़े कलाकार अवॉर्ड शो का बहिष्कार करते हैं और धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ते जा रही है. ये वो लोग नहीं हैं, जिन्होंने अवॉर्ड जीत न पाने के खुन्नस में वहां जाना छोड़ दिया, बल्की इन्होंने कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं.

इनकी स्क्रिप्ट फ़नी नहीं फ़ूहड़ होती है

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कुल मिलाकर अवॉर्ड गैंग के पास 15 एंकर होते हैं, जो सभी शो होस्ट करते हैं. शाहरुख ख़ान, रितेश देशमुख, बमन इरानी, कुछ ट्रेंडिंग कमीडियन, और पता नहीं इनकी स्क्रिप्ट्स किस से लिखवाई जाती है. इतने वाहियात जोक्स क्रैक होते हैं, उसे सुन हंसी तो छोड़िए रोना आ जाता है.

ये अवॉर्ड शो 'अवॉर्ड' को ही बदनाम कर रहे हैं.

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गंभीर बात ये भी है कि जो गिने-चुने अच्छे अवॉर्डस हैं, वो भी इनकी वजह से बदनाम हो रहे हैं, उनकी वेल्यु ख़त्म हो रही है. अवॉर्ड पाना कलाकारों के लिए सम्मान की बात नहीं रही, उल्टे उन्हें शक की निगाहों से देखा जाने लगा.

बनावटीपन से भरपूर

फ़ालतू के ड्रामे, एडिटिंग से डाली गईं तालियों की आवाज़, स्टार्स के मुस्कुराते चेहरे, बेमतलब का ज़ूम इन-ज़ूम आउट. ये सब नकली नहीं, तो और क्या है. जो चीज़ें टीवी शो में होती हैं, TRP बटोरने के लिए, उन्हें अवॉर्ड शो में घुसा दिया है.

कुल मिला कर इतनी सी बात है कि बॉलीवुड की बेहतरी इसी में है कि वो ये अवॉर्ड शो बंद कराए और अपनी बची-खुची इज़्ज़त बचाए.