99 टेस्ट, 45 की औसत से 6,216 रन, 22 शतक और 21 अर्धशतक. ये एक ऐसे खिलाड़ी का आंकड़ा है, जिसे क्रिकेट जगत ने शुरुआत में सिर आंखों पर बैठाया, लेकिन करियर का अंत आते-आते उसे क्रिकेट से ही बेदखल कर दिया गया.

90 के दशक में जब भारतीय टीम युवा खिलाड़ियों से सज रही थी. सचिन, कांबली, मांजरेकर, मोंगिया, श्रीनाथ जैसे कई खिलाड़ी अपनी जगह टीम में बनाने की कोशिश कर रहे थे और कपिल देव, श्रीकांत जैसे खिलाड़ी क्रिकेट को अलविदा कह रहे थे, तब टीम को एक ऐसे कप्तान की ज़रूरत थी, जो युवाओं को साथ ले कर चले. टीम की युवा ब्रिगेड को क्रिकेट की छोटी-छोटी बारीकियों से अवगत कराए, तब सलेक्टर्स ने इस काम की बागडोर दी मोहम्मद अज़हरुद्दीन के हाथ में.

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कलाइयों के जादूगर नाम से जाने जाने वाले इस बल्लेबाज़ ने अपने टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत 1984 के अंत में की थी. दुबला-पतला सा लड़का, जिसकी बल्लेबाज़ी से ज़्यादा लोग उसकी फ़ील्डिंग से प्रभावित हुए. अज़हर उस वक़्त के कुछ चुनिंदा बेहतरीन फ़िल्डर्स में से एक थे, जो मैदान में डाईव लगा कर बॉल रोका करते थे.

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हर किसी को अज़हर से काफ़ी आशाएं थीं. 1996 के वर्ल्ड कप में भारत ने इनकी कप्तानी में सेमीफ़ाइनल तक का सफ़र तय किया. श्रीलंका से मिली हार ने पहली बार अज़हर की कप्तानी के ऊपर सवालीया निशान खड़े किए. पिच के हालात को देखने के बावजूद उन्होंने टॉस जीत कर पहले गेंदबाज़ी चुनी और इसी फ़ैसले ने टीम को वर्ल्ड कप की रेस से बाहर कर दिया.

अज़हर इकलौते ऐसे कप्तान हैं, जिन्होंने तीन वर्ल्ड कप में भारतीय टीम की कप्तानी की. 1993, 96 और 99 में भारतीय टीम के कप्तान रहे अज़हर का बुरा दौर शुरू हुआ साल 2000 में. साऊथ अफ्रीका के खिलाफ़ खेली घरेलू सीरीज़ में दोनों ही टीमों के कप्तानों के ऊपर मैच फ़िक्सिंग के आरोप साबित हुए और दोनों पर ही आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया.

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अज़हर उस वक़्त तक 99 टेस्ट खेल चुके थे. लेकिन उनकी क्रिकेट से ऐसे विदाई होगी उनके आलोचकों ने भी नहीं सोचा था.

वक़्त बीता और अज़हर ने राजनीति की तरफ़ रुख किया. 2009 में कांग्रेस से जुड़े और इसी साल आम चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से सांसद चुने गए.

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लेकिन इनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी भी कई मामलों में उतार-चढ़ाव से भरी रही. संगीता बिजलानी से 1996 में शादी और फिर 2010 में तलाक़ हुआ. वजह थी उनका बैटमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा के साथ रिश्ता, जिसे साफ़ तौर पर दोनों ने ही नकार दिया था. साल 2011 में अपने छोटे बेटे को अज़हर ने एक स्पॉर्ट्स बाइक ईद के मौके पर तोहफ़े में दी. लेकिन वही तोहफ़ा उनके लिए सबसे बड़ा दुख ले कर आया. बाइक दुर्घटना ने अज़हर के छोटे बेटे की जान ले ली.

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अज़हर के ऊपर से हैदराबाद हाई कोर्ट ने 2012 में आजीवन प्रतिबंध तो हटा दिया, लेकिन उनके लिए तब तक क्रिकेट में कोई जगह बची नहीं थी. आज वो एक सफ़ल राजनेता है. इनकी ज़िंदगी पर एक फ़िल्म भी बनी. जिसमें मैच फिक्सिंग का एक अलग ही पहलू दिखाया गया. लेकिन लोगों को ये फ़िल्म ज़्यादा पसंद नहीं आई.

अपनी पूरी लाईफ़ में अज़हर ने इतने उतार-चढ़ाव देखे हैं कि सच में उनकी ज़िंदगी किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं लगती. लोग उनके बारे में वही सोचते हैं, जितना उन्हें पता है. लेकिन एक बात हर कोई मानेगा कि ये खिलाड़ी, क्रिकेट हो या राजनीति हर जगह कप्तान ही है.