कहते हैं कि भारतीय महिलाओं की सुन्दरता का पैमाना बड़ा ही अद्भुत है. सांवली-सलोनी, तीखे नैन-नक्श और लम्बे-काले बालों वाली लड़की को कोई भी देखता है, तो वो उसकी नज़रों में बस जाती है. ऐसी लड़की अगर साड़ी पहने हुए है, तो फिर उसकी खूबसूरती में चार-चांद और लग जाते हैं. कोई चाहे कितनी ही आधुनिक ड्रेसेज़ पहन लें, लेकिन ख़ास मौकों पर भारत की हर लड़की खुद को साड़ी में ही शायद सबसे खूबसूरत महसूस करती है. यही कारण है कि हर त्योहार और समारोह में लड़कियां साड़ी को ही प्राथमिकता देती हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसी साड़ियों के बारे में, जो भारतीय महिलाओं के लिए बेहद मायने रखती हैं.

कांजीवरम

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आमतौर पर यदि पूछा जाए कि दक्षिण की महिलाओं की पहचान क्या है, तो उत्तर होगा लंबे बालों पर सजी खूबसूरत वेणी और तीखे-नाक-नक्श... और... और... जी हां... कांजीवरम की खूबसूरत तथा भारी-भरकम साड़ियां. शायद इतना पढ़कर आपको बॉलीवुड ऐक्ट्रेस रेखा, जयप्रदा, वैजयंती माला की याद आ जाए.

ट्रेडिशनल रिच कलर्स में मिलने वाली ये कांजीवरम साड़ियां इंडिया की सबसे ज्यादा मशहूर और महंगी साड़ियों में हैं. इस सिल्क का नाम तमिलनाडु के एक गांव पर है, जहां इस सिल्क को बनाया जाता है. बाकी सिल्क साड़ियों के मुकाबले ये साड़ियां काफी भारी होती हैं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले सिल्वर धागे गोल्ड में डिप होते हैं, वहीं मोटिफ्स मोर और तोते से इंसपायर्ड होते हैं. इस साड़ी का सबसे बेस्ट पार्ट होता है इसका पल्लू, जो अलग से बनाकर बाद में साड़ी से जोड़ा जाता है.

बनारसी साड़ी

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रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग जरी के डिज़ाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली सुंदर रेशमी साड़ी को बनारसी साड़ी कहते हैं. इसका क्रेज़ हमेशा ही महिलाओं में रहा है. इसे सुहाग की निशानी भी माना जाता है. मल्टी बनारसी साड़ी, पौड़ी, पौड़ी नक्काशी, कतान अम्बोज, टिपिकल बनारसी जंगला, एंटिक बूटा, जामेवार, कतान प्लेन,कतान फैंसी, तनछुई बनारसी आदि कई वरायटीज़ में ये साड़ियां उपलब्ध हैं.

महाराष्ट्रियन साड़ी

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महाराष्ट्र में खास तरह की साड़ी पहनी जाती है, जो नौ गज लंबी होती है, इसे पैठणी कहते हैं. यह पैठण शहर में बनती है. इस साड़ी को बनाने की प्रेरणा अजन्ता की गुफा में की गई चित्रकारी से मिली थी. इसे पहनने का अपना पारंपरिक स्टाइल है, जो महाराष्ट्र की औरतों को ही अच्छी तरह से आता है.

रॉ सिल्क

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ये गोंद से बनती है, जो काफी डल और कड़ा होता है. ये सेरिसिन के कवर में और कई कलर्स में मौजूद होता है. इससे सिल्क निकालने के लिए लम्बी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है.

कोरा सिल्क

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ये साड़ी काफी हल्की होती है, जिसे कई कलर्स और डिज़ाइन्स की कोरा सिल्क फैब्रिक से बुना जाता है. कोरा सिल्क का अपना अलग ही चार्म है.

महेश्वरी साड़ी

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यह साड़ी खासकर मध्य प्रदेश में पहनी जाती है. पहले यह सूती साड़ी ही बनाई जाती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे रेशम की भी बनाई जाने लगी है. इसका इतिहास काफी पुराना है. होल्कर वंश की महान शासक देवी अहिल्याबाई ने 250 साल पहले गुजरात से लाकर महेश्वर में कुछ बुनकरों को बसाया था और उन्हें घर, व्यापार और अन्य सुविधाएं दी थींं. यही बुनकर महेश्वरी साड़ी तैयार करते थे.

चंदेरी साड़ी

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चंदेरी की विश्व प्रसिद्ध साड़ियां आज भी हथकरघे पर ही बुनी जाती हैं, यही इनकी विशेषता है. इन साड़ियों का अपना समृद्धशाली इतिहास रहा है. पहले ये साड़ियां केवल राजघराने में ही पहनी जाती थीं, लेकिन अब यह आम लोगों तक भी पहुंच चुकी हैं. एक चंदेरी साड़ी बनाने में एक बुनकर को साल भर का वक्त लगता है, इसीलिए चंदेरी साड़ियों को बनाते वक्त कारीगर इसे बाहरी नजरों से बचाने के लिए हर मीटर पर काजल का टीका लगाते हैं.

मैसूर सिल्क

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ये साड़ी भी रिचनेस और ट्रेडिशनल टच की वजह से काफी जानी जाती है. ये साउथ इंडिया की कई मशहूर साड़ियों में गिनी जाती है. ये सिल्क मलबेरी सिल्क से बनता है, जो कर्नाटक में आराम से मिल जाता है.

नारायणपेट सिल्क

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इस साड़ी में एम्ब्रॉयडरी के साथ चेक्ड सरफेस पैटर्न होते हैं, जो मिलकर बॉर्डर या पल्लू पर बहुत ही खास डिज़ाइन बनाते हैं, जैसे किसी मंदिर की आउटलाइन. इन साड़ियों की शुरुआत तेलंगाना के नारायणपेट डिस्ट्रिक से 1630 ईसा पूर्व में होने के कारण इसका ये नाम पड़ा. साड़ी के बॉर्डर पर छोटे ज़री डिज़ाइन्स से कंट्रास्ट लुक मिलता है, जो इसे सिल्क पसंद करने वालों और ब्राइड्स के लिए स्पेशल बनाता है.

धर्मावरम सिल्क

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ये सिल्क साड़ियां आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में बनाई जाती हैं. इन साड़ियों की भव्यता देखकर उसे बनाने में लगी मेहनत साफ पता चलती है. इसे बनाने वाले इन साड़ियों पर बूटीज़ और डॉट्स से ट्रेडिशनल डिज़ाइन बनाकर इसे और भी खूबसूरत बना देते हैं. इसके बॉर्डर पर भी कई कलर्स का काम दिख जाता है.

गढ़वाल सिल्क

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इन साड़ियों को सिल्क से बुनते हुए इनके पल्लू और बॉर्डर को कंट्रास्ट में रखा जाता है, जिन पर ट्रेडिशन गढ़वाल फ़ेमिली से जुड़े स्टोन और वुड कार्विंग देखे जा सकते हैं. कॉटन और सिल्क के कॉम्बिनेशन से स्मॉल चेक्स की बनावट वाली इन साड़ियों का पल्लू और बॉर्डर रिच सिल्क और गोल्ड से बना होता है.

पटोला साड़ी

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यह साड़ी मुख्यतः हथकरघे से बनती है. पटोला साड़ी दोनों ओर से बनाई जाती है और इसमें बहुत ही बारीक काम किया जाता है. यह रेशम के धागों से बनाई जाती है. पटोला डिज़ाइन और पटोला साड़ी अब लुप्त होने की कगार पर है, क्योंकि इसके बुनकरों को लागत के हिसाब से कीमत नहीं मिल पाती है.

तो अब बताइए कि इनमें से आपको कौन-सी साड़ी पसंद है!