हमें जो मिलता है, अकसर उससे ज़्यादा की चाह हमें होती है. इसी कारण से कई बार हम अपने माता-पिता पर ज़ोर डालते हैं. हम ये कभी नहीं सोचते कि हमारी ज़िद पूरी करने के चक्कर में उन्हें किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन वो मां-बाप हैं, चुपचाप हमारी ज़िद और खुशी के लिए लगातार वो सारी परेशानियां झेलते हैं.

इस शख़्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक दुर्घटना में अपना दायां हाथ खो देने वाले MD. Kawsar Hossain अपनी बच्ची की खुशी के लिए दो साल से पैसे जोड़ रहे थे. एक हाथ खो देने की वजह से उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली और हालात भीख मांगने तक आ पहुंचे.

दो साल से अपने बेटी को कुछ भी न देने पाने का गम उन्हें खाए जा रहा था. अपनी बेटी को नए कपड़ों में देखने की चाह के कारण वो अपना पेट काट कर रोज़ पैसे जोड़ रहे थे.

लेकिन किसी गरीब को कुछ भी मिलना इतना आसान नहीं होता. Hossain ने बताया कि इन दो सालों में उन्होंने 5 के नोट जोड़े थे, जिनकी संख्या 60 के करीब थी. जब दुकानदार को उन्होंने इन पैसों को थमाया, तब दुकानदार ने चिल्लाते हुए पूछा कि, 'भिखारी हो क्या?' इससे उनकी बेटी को काफ़ी बुरा लगा और भरी आंखें ले कर वो दुकान से जाने लगी. Hossain ने अपनी बेटी को रोका और शालीनता से दुकानदार को बताया कि, 'हां, मैं भिखारी हूं'.

Hossain बताते हैं कि ड्रेस की खुशी उनकी बच्ची के चेहरे पर साफ़ दिख रही थी और इसलिए उन्होंने उस दिन काम से छुट्टी ली. उन्हें पता था कि आज वो कुछ भी नहीं कमा पाएंगे, लेकिन बेटी के साथ बिताए पल पैसों से बड़ा है.

Hossain की ये कहानी बताती है कि पिता के लिए उनके बच्चों के प्यार से बड़ा कुछ नहीं होता. वो हर परेशानी का सामना करने को तैयार रहते हैं, अपने बच्चों की ख़्वाहिशों और मुस्कान के लिए.

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