गायकी की दुनिया में ग़ज़ल का नाम बेहद एहतराम के साथ लिया जाता है. बड़े-बड़े शायरों ने इसे अपनी क़लम की नोक से संवारा है, उम्दा गायकों ने इसे अपने गले की मिठास में डुबोया है. शायद इस वजह से ग़ज़ल गायकी को क्लासिकल संगीत का दर्जा हासिल है.

जहां एक तरफ़ फ़िल्मों में ऐसे संगीत को रखा जाता है, जिसे आम इंसान भी आसानी से समझ सके, उसे गुन-गुना सके. दूसरी तरफ़ क्लासिकल संगीत होता है, जिसे गाने के लिए, समझने के लिए एक अलग ट्रेनिंग होती है. इसके बावजूद कई मरतबा फ़िल्मी संगीत ने ग़ज़ल गायकी को कुलीन वर्ग के डाईनिंग रूम से निकाल कर बिना उसकी व्याकरण को छेड़े, बहुत शालीनता से आमजन की मेज़ पर रखा.

ये हैं बॉलीवुड की 10 बेहतरीन ग़ज़लें, जिनके लिए हमें बॉलीवुड का शुक्रगुज़ार होना चाहिए:

1. चुपके-चुपके रात दिन

फ़िल्म- निकाह, गायक- ग़ुलाम अली, लेखक- हसरत मोहनी

फ़िल्म में इस ग़ज़ल के सभी शेरों को नहीं लिया गया था. फ़िल्म की अपनी मजबूरियां होती हैं, इसके बावजूद ग़ुलाम अली की इस ग़ज़ल को सभी ने सुना और सराहा. ग़ुलाम अली ने अपनी महफ़िलों में इस ग़ज़ल के पूरे शेर गाए हैं.

2. होश वालों को ख़बर क्या

फ़िल्म- सरफ़रोश, गायक- जगजीत सिंह, लेखक- निदा फ़ाजली

अगर आप ग़ज़ल के प्रशंसक न भी हों, तब भी सरफ़रोश फ़िल्म का ये गाना आपकी प्लेलिस्ट में ज़रूर होगा. रुमानियत से लबरेज़ ये ग़ज़ल दिल की ज़मीन तक जाती है. इसे फ़िल्माया भी उसी पाक़ मिज़ाजी के साथ गया है.

3. नग़्मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूं

फ़िल्म- गज़ल, गायक- लता मंगेशकर, लेखक- साहिर लुधयानवी

इस गज़ल के कई वर्ज़न मौजूद हैं, सभी वर्ज़न की अपनी एहमियत हैं. इस गज़ल को रफ़ी साहब ने भी आवाज़ दी है. हालांकि लोगों को लता जी वर्ज़न ही ज़्यादातर याद रहता है.

4. ऐ दिले नादां

फ़िल्म- रज़िया सुल्तान, गायक- लता मंगेशकर, लेखक- जां निसार अख़्तर

मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर के पिता जां निसार अख़्तर ने इस उम्दा गज़ल को कागज़ पर उतारा था, इस मशहूर ग़ज़ल को हेमा मालिनी के ऊपर फ़िल्माया गया है.

5. हुई शाम उनका ख़्याल आ गया

फ़िल्म- मेरे हमदम मेरे दोस्त, गायक- मुहम्मद रफ़ी, लेखक- मजरूह सुल्तानपुरी

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में सजी ये उदास गज़ल फ़िल्म 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' के लिए तैयार की गई थी.

6. सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान से क्यों है

फ़िल्म- गमन, गायक- सुरेश वाडेकर, लेखक- शहरयार

शहर की भागती ज़िंदगी और उसमें जी रहे बैचेन इंसान की आह को इस ग़ज़ल की जानिब से आवाज़ दी गई है. सुरेश वाडेकर और फ़ारुख़ शेख़ ने शहरायार की लिखी इस ग़ज़ल में चार चांद लगा दिया.

7. जुस्तुजु जिसकी थी उस को तो पाया न हमने

फ़िल्म- उमराव जान, गायक- आशा भोसले, लेखक- शहरयार

आशा भोसले की पहचान एक क्लासिकल सिंगर के तौर पर नहीं है, बावजूद इसके उन्होंने इस ग़ज़ल को बख़ूबी गाया है.

8. कभी ख़ुद पे कभी हालात पर रोना आया

फ़िल्म- हम दोनों, गायक- मुहम्मद रफ़ी, लेखक- साहिर लुधियानवी

इस गज़ल के माध्यम से साहिर और रफ़ी की जोड़ी ने देवानंद के लिए एक और बेहतरीन गीत दिया.

9. तंग आ चुके हैं

फ़िल्म- प्यासा, गायक- मुहम्मद रफ़ी, लेखक- साहिर लुधियानवी

इस गज़ल में गुरुदत्त अपने ग़म के साथ मंच पर खड़े हैं और एक सुनने वाले ने उनसे एक ख़ुशी के गीत की मांग की थी.

10. तुमको देखा तो ये ख़्याल आया

फ़िल्म- साथ-साथ, गायक- जगजीत, चित्रा सिंह सिंह, लेखक- जावेद अख़्तर

जगजीत और चित्रा की जोड़ी का तैयार किया गया एक और शानदार रत्न. ये तब की बात है जब जावेद अख़्तर ने फ़िल्मों के लिए नया-नया गीत लिखना शुरू किया था.