हाथ पर हाथ उठा कर और कमर को थोड़ा झुका कर डांस करना, जानते हैं ये किसका स्टेप है?

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बच्चा भी बता देगा, बच्चन का!

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जवाब गलत है जनाब, क्योंकि बच्चन साहब के ये स्टेप उनका है ही नहीं. इस मस्तमौला और हरफ़नमौला डांस का ईजाद किया था भारतीय सिनेमा के एक ऐसे सितारे ने, जिसको आज की जनरेशन भले ही न जानती हो, लेकिन अमिताभ बच्चन, गोविंदा, मिथुन चक्रवर्ती में उनकी झलक दिखती है.

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भगवान अभाजी पलव, जिन्हें भारतीय सिनेमा भगवान दादा के नाम से जानता है. भगवान दादा ने 1938 में अपनी पहली फ़िल्म 'बहादुर किसान' में काम किया था, लेकिन दुनिया उन्हें जानती है 1952 में गीता बाली के साथ आयी उनकी फ़िल्म, 'अलबेला' से. इस फ़िल्म ने भगवान दादा को बॉलीवुड का वो स्टार बना दिया था, जो जब नाचता था, तो उसके हाव-भाव हीरोइन को भी फ़ेल कर देते.

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उस ज़माने के हिसाब से उनका डांस इतना मखमली, नैसर्गिक और दिलखुश करने वाला था कि उसका मुकाबला आज तक कोई एक्टर नहीं कर पाया. वो हर धुन को अपना बना लेते और उस पर एक्सप्रेशन का ऐसा तड़का लगाते कि आपकी आंखें उनके डांस साथ चलने लगती.

जिन्हें अभी भी भगवान दादा याद नहीं, उन्होंने ये गाना तो पक्का सुना होगा, 'भोली सूरत दिल के खोटे, नाम बड़े और दर्शन छोटे'... इस गाने में जो इंसान हवा की तरह डांस कर रहा है, वो हैं भगवान दादा.

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'अलबेला' फ़िल्म के सारे गाने आज के हिसाब से Chartbusters थे. चाहे 'वो शोला जो भड़के' हो या 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीठी बजाना छोड़ दो'... इस फ़िल्म ने भगवान दादा को डांस का शहंशाह बना दिया था.

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बिग बी का हाथ वाला स्टेप

अब कहानी बताते हैं बिग बी के इस स्टेप की. अमिताभ बच्चन को दादा का ये स्टेप इतना सिंपल, स्वाभाविक और बेहतरीन लगा कि उन्होंने इसे अपना लिया और आज हर आदमी, जिसे डांस नहीं आता, वो इस स्टेप को करता है. असल में ये भगवान दादा का इन्वेंशन था.

गोविंदा का हंसता हुआ चेहरा

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गोविंदा जैसे एक्सप्रेशंस हर डांसर या एक्टर के बस की बात नहीं. लेकिन चीची जो डांस करते हुए हंसते हुए मज़ेदार हाव-भाव बनाते हैं न, उसकी शुरुआत भी भगवान दादा ने की थी. एक जगह पर खड़े रह कर एक्सप्रेशन से ही डांस करने वाले भगवान दादा से ही इंस्पायर्ड है गोविंदा का डांस.

मिथुन दा का तूफ़ानी डिस्को

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मिथुन दा के डिस्को डांसर वाले गाने ने ऐसा तूफ़ान मचाया था कि गली का हर बच्चा अज भी वो स्टेप करता है. इस फुर्तीले डांस की नींव भी भगवान दादा की ही देन है.

भले ही अलबेला के बाद भगवान दादा की कोई फ़िल्म सफ़ल नहीं हुई हो, लेकिन उन्होंने अपने डांस से और एक ही फ़िल्म से वो मुकाम पा लिया, जिसे पाने में बाकी लोगों को सालों लग जाते हैं.

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उनका डांस सिर्फ़ नृत्य या मनोरंजन नहीं, बल्कि हर आम आदमी के लिए एक ऐसी क्रांति थी, जिसने हर किसी के लिए डांस को आसान बना दिया. डांस को अभी तक एक आर्ट के रूप में देखते आये लोगों को, इसे पहली बार खुद क्रिएट करने का मौका मिला और इसका श्रेय जाता है भगवान दादा को.