60 के दशक को भारतीय सिने-जगत का सुनहरा दौर कहा जा सकता है. इस दौर ने हमें बहुत-सी यादगार फ़िल्में दी हैं. इसी सुनहरे दौर के एक्टर थे सुनील दत्त, जिनके किरदारों में अलग तरह की कशमकश नज़र आती थी. फिर चाहे बात उनकी सुपरहिट फ़िल्म 'मदर इंडिया' के कैरेक्टर बिरजू की हो, या फिर डकैतों पर बनी फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के ठाकुर जरनैल सिंह की. उनके द्वारा निभाया गया हर किरदार पर्दे पर जीवंत होता दिखाई देता था. सुनील दत्त साहब का फ़िल्मी करियर जितना शानदार था, उतनी ही दिलचस्प थी उनकी रियल लाइफ़. उन्होंने अपनी ज़िदगी के हर पहलू को बहुत शानदार तरीके से जिया था. चलिए आज आपको इस रियल आयरनमैन की असल ज़िदगी से रूबरू करा देते हैं.

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मदर इंडिया के रिलीज़ होने के एक साल बाद 1958 में सुनील दत्त और नरगिस ने शादी कर ली थी. ये अपने आप में लोगों के लिए बहुत ही अजीब था, क्योंकि इस फ़िल्म में दोनों मां-बेटे का किरदार निभाया था. उस ज़माने में इस बात को पचा पाना भारतीय के लिए आसान नहीं था. वहीं दूसरी तरफ़ नरगिस और राज कपूर के अफे़यर से लोग वाकिफ़ थे. राज कपूर ने नरगिस का दिल तोड़ दिया था और वो उस वक़्त अंदरूनी तौर पर टूट चुकीं थीं. ऐसे में सुनील दत्त ने उन्हें पूरी तरह से सपोर्ट किया. दत्त साहब ने कभी उनसे कोई सवाल नहीं पूछा और न ही कभी उन्हें जज करने की कोशिश की. इस बात को नरगिस ने भी अपने एक इंटरव्यू में कुबूल किया था. तब उन्होंने दत्त साहब के बारे में कहा था- 'उनके कंधों पर सिर रखकर जी भर के रो सकती थी, पर उन्होंने कभी मेरे आंसुओं को दुनिया के सामने नहीं आने दिया.'

आदर्श पिता

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एक अच्छे पति के साथ ही सुनील दत्त ने एक आदर्श पिता का भी किरदार इन्होंने बख़ूबी अदा किया. नरगिस दत्त की बीमारी के बाद बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर आ गई थी. उस पर से संजय दत्त का ड्रग एडिक्ट होना और बाद में जेल जाना. वो अपने बच्चों के साथ हमेशा खड़े नज़र आए. 1993 के बॉम्ब बलास्ट केस में जब संजय दत्त को गिरफ़्तार कर लिया गया, तब भी उन्होंने अपने बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए भरसक प्रयास किए. वो नहीं चाहते थे कि उनके बेटे को कोई टेररिस्ट बुलाए, शायद यही वजह है कि संजय ने अपने सारे गुनाह कुबूल लिए और इसके लिए सज़ा भी काटी. वहीं जब संजय जेल से बाहर आए तो वो एक अलग ही इंसान थे, जिसके पीछे यकीनन सुनील दत्त की परवरिश का ही हाथ था.

शांति दूत

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सुनील दत्त ने देश और दुनिया में शांति कायम रखने के लिए भी अथक प्रयास किए. 1987 में पंजाब में खालिस्तान मूवमेंट की वजह से तनाव का माहौल था. इसे ख़त्म करने के लिए उन्होंने मुंबई से अमृतसर तक पदयात्रा की थी. 2000 किलोमीटर का ये सफ़र उन्होंने अपनी बेटी और 80 अन्य लोगों के साथ पैदल ही तय किया था. इसके बाद वहां शांति फिर से कायम हो गई थी. 1988 में जापान के नागासाकी और हिरोशिमा में परमाणू हथियारों के ख़िलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. इसके अलावा पड़ोसी देशों में भी उन्होंने अपने 'Hands Across the Borders' शांतियात्रा की थी.

आर्दश नेता

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सुनील दत्त ने अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत 1984 में की. तब वो मुंबई की उत्तर-पश्चिम सीट से कांग्रेस की तरफ़ से 8वीं लोकसभा के लिए चुने गए थे. 2004 में वो मनमोहन सिंह की सरकार में खेल मंत्री बनाए गए थे. इस दौरान उन्होंने आवाम की भलाई के लिए बहुत ही सराहनीय कार्य किए. वो एक ऐसे नेता थे, जो पार्टी के लिए नहीं जनता के लिए काम करते थे. वो हर वक़्त जनता के साथ खड़े नज़र आते थे. यही वज़ह है जब बाबरी मस्जिद कांड हुआ था, तब सुनील दत्त ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. क्योंकि उनकी सरकार अपनी नाकामी पर पर्दा डाल लोगों को गुमराह कर रही थी.

सुनील दत्त की फ़िल्म 'जानी दुश्मन' का एक फ़ेमस डायलॉग है- 'मर्द तैयारी नहीं करते… हमेशा तैयार रहते हैं.' उनकी लाइफ़ पर भी ये बिल्कुल फ़िट बैठता है. इसलिए उन्हें रियल आयरनमैन कहना ग़लत न होगा.