तेजा मैं हूं मार्क इधर है, नहीं तेजा मैं हूं मार्क इधर है...अब आप कहेंगे... ये तेजा-तेजा क्या है, ये तेजा-तेजा...

ये बॉलीवुड की उस फ़िल्म का डायलॉग है, जो अपने दौर की सुपरफ़्लॉप फ़िल्मों की लिस्ट में आती है, लेकिन यही वो फ़िल्म है जिसने बॉलीवुड के इतिहास में कॉमेडी की एक नई परिभाषा गढ़ी थी. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि हम किस फ़िल्म की बात कर रहे हैं, क्या अभी भी नहीं समझे... उफ़, चलो कोई नहीं हम ही बता देते हैं. ये है 'अंदाज़ अपना अपना'. जी हां, यही वो फ़िल्म है जो फ़्लॉप होने के बावजूद आज भी हर किसी के लैपटॉप में या हार्डडिस्क में ज़रूर होगी और इस को जितनी बार भी देखा जाए हर बार कोई नई बात नोटिस की जा सकती है और हंसी पर तो कंट्रोल करना पॉसिबल ही नहीं है. ऐसा ही कुछ हुआ कल रात मेरे साथ, जब मैंने ये फ़िल्म देखी और रात के 1:30 बजे मैं पेट पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी.

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अब क्या करें कंट्रोल ही नहीं होता न... ये बॉलीवुड की एक ऐसी फ़िल्म है, जो आने वाले 100 सालों बाद भी एकदम ताज़ा और फ्रेश लगेगी. फ़िल्म का एक-एक किरदार अपने आप में ख़ास है. फ़िल्म की टाइमिंग, डायलॉग्ज़, कलाकारों का अभिनय सब आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ हंसाएगा ही. ये फ़िल्म भले ही उस दौर की फ़्लॉप फ़िल्म थी, लेकिन आज ये बॉलीवुड की कल्ट मूवीज़ में से एक है. इसका एक-एक डायलॉग लोगों को आज भी याद होगा और फ़िल्म के किरदारों की तो बात ही क्या की जाय... चाहे वो क्राइम मास्टर गोगो हो, या फिर तेजा, या ‘रॉबट’, ‘भल्ला’ और अमर-प्रेम. आज भी इस फ़िल्म को देखकर पुराना नहीं लगता आज भी उसकी कॉमेडी को देखकर उतनी ही हंसी आती है, जितनी उस वक़्त आती थी. अगर कभी भी बॉलीवुड की कॉमेडी फ़िल्म्स की बात होगी, सबसे पहले अंदाज़ अपना अपना का नाम ही लिया जाएगा. फ़िल्म ने जो बेंचमार्क सेट किया है, इसकी रिलीज़ के 23 सालों बाद भी कोई वहां पहुंच नहीं पाया है.

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अगर आपने अभी तक ये फ़िल्म नहीं देखी है, तो जनाब 'मैं तो कहता हूं आप पुरुष ही नहीं... महापुरुष हैं, महापुरुष...' गुस्ताख़ी माफ़... ये फ़िल्म का ही एक डायलॉग है. पर सच्ची अगर नहीं देखी अभी तक तो आज ही देख लीजिये, सच बोल रहे हैं, बार-बार न देखें तो बोलना. और इतना कहने के बाद भी नहीं देखी, तो सोच लो क्राइम मास्टर गो गो (क्राइम मास्टर गो गो नाम है मेरा, आंखें निकालकर गोटीयां खेलता हूं मैं.) आ जाएगा. फिर आपका सवाल एक होगा हमारे जवाब दो, मतलब 'आपका एक सवाल, हमारे दो-दो जवाब. सवाल एक, जवाब दो...'. अब क्या कहें फ़िल्म के डायलॉग्ज़ में इतना पंच हैं कि रटे पड़े हैं, जब-तब मुंह से निकल ही जाते हैं.

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आज भी फ़िल्म का नाम आते ही उसके डायलॉग्ज़ और किरदारों के हाव-भाव आंखों के सामने आ जाते हैं और हमको गुदगुदा जाते हैं, अगर आपने ये फ़िल्म देखी है, तो आप मेरी बात से इत्तेफ़ाक़ रखेंगे.

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वैसे भी बॉलीवुड में कुछ ही अच्छी मूवीज़ हैं जिनके लिए ब्लॉकबस्टर लिखा जाना सही है. लेकिन 'अंदाज़ अपना अपना' के साथ भले ही ब्लॉकबस्टर नहीं लिखा गया है पर मेरी समझ से तो ये एक क्लासिक मूवी है, जो फ़्लॉप होने के बाद भी हिट थी, है और रहगी. बॉलीवुड की सदाबाहर फ़िल्मों में इसका नाम हमेशा सबसे पहले आएगा.

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अगर आंकड़ों की बात की जाते तो माना जाता है कि हर साल अलग-अलग भाषाओं में लगभग 1600 फ़िल्में बनाई जाती हैं. कुछ फ़्लॉप होती हैं, तो कुछ आज की तारीख़ में हज़ार करोड़ से ज़्यादा का बिज़नेस करती हैं. आज वो टाइम है जब बॉलीवुड की फ़िल्मों में आधे से ज़्यादा फ़िल्मों में स्पेशल इफ़ेक्ट का ही कमाल होता है, पर इस फ़िल्म में न ही स्पेशल इफ़ेक्ट्स का कमाल है और न ही फूहड़ता का तड़का, इसमें अगर कुछ है तो वो है कॉमेडी, कॉमेडी और सिर्फ़ कॉमेडी... वरना आज की फ़िल्मों में मज़ाक के नाम पर डबल मीनिंग डायलॉग्ज़, नग्नता, बेसिर-पैर के गाने ही ज़्यादा सुनने को मिलते हैं.

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फ़िल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक केवल मज़ेदार संवाद और हाव-भाव ही हैं, जो फ़िल्म की आम सी कहानी को बांधते हैं और दर्शक हंसते हुए पूरी फ़िल्म देखते हैं.

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मैं आखिर में एकबार फिर कह रही हूं कि ऐसी फ़िल्म न इन 23 सालों में बनी है और न ही आगे आने वाले 50 सालों में बनेगी.