साहित्य को अगर समंदर मानें, तो लेखक एक खेवट की तरह है, जो कविताओं और कहानियों के ज़रिये सोच को कल्पनाओं के पार ले जाता है. ऐसे ही एक खेवट का नाम है हरिवंश राय बच्चन, जिनकी साहित्य साधना ने उन्हें ऐसे स्तर पर पहुंचा दिया, जहां से वो छोटी-से-छोटी चीज़ों में भी कवितायें तलाशने लगे. हिंदी साहित्य की दृष्टि से देखें, तो हरिवंश साहब अपने आप में एक ऐसा समंदर हैं, जिसकी तलहटी पर कविताओं का खज़ाना छिपा हुआ है. हरिवंश जी के जन्मदिवस पर आज हम आपके लिए उनकी कुछ ऐसी कविताओं को ले कर आये हैं, जो विशुद्ध हिंदी में होने के बावजूद बॉलीवुड का हिस्सा बनी और लोगों की ज़बान पर चढ़ गयी.

रंग बरसे

फ़िल्म 'सिलसिला' का ये गीत आज हर होली पार्टी की पहचान बन चुका है. ये ख़ूबसूरत गाना हरिवंश साहब की क़लम से निकला, जिसमें अपनी आवाज़ दे कर अमिताभ बच्चन ने चार चांद लगा दिए.

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कोई गाता, मैं सो जाता

1977 में आई फ़िल्म 'आलाप' बॉक्स ऑफ़िस पर उतनी सफ़ल नहीं रही, जितनी बड़ी स्टारकास्ट के साथ इसे पर्दे पर लाया गया था. इसके बावजूद फ़िल्म का ये गीत उस समय लोगों के पसंदीदा गीतों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा था.

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अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

फ़िल्म 'अग्निपथ' का मूल भाव कविता में पिरो कर सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाने का काम हरिवंश साहब ने ईमानदारी के साथ किया.

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मधुशाला

1976 में आई एल्बम 'मधुशाला' में लोगों ने पहली बार मन्ना डे और हरिवंश राय बच्चन की जोड़ी को एक साथ देखा. ये पहला ऐसा मौका था, जब उस समय के दो महान कलाकार मन्ना डे और हरिवंश साहब साथ मंच साझा कर एक ऐसी काव्यशाला लिख रहे थे, जो वर्षों बाद आज भी लोगों की ज़बान चढ़ी हुई दिखाई देती है.

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