अकसर हमें कहा जाता है कि जो आज हमें मिल रहा है वो पिछले जन्मों का परिणाम है. हमारे पिछले जन्मों के कर्म हमें अपने होने वाले अगले जन्मों में भुगतने पड़ते हैं, या हमारा अच्छा और बुरा वक़्त हमें मिले आशिर्वाद या श्राप की देन होता है. कई लोग इसे दकियानूसी बातें मान सकते हैं. लेकिन हिन्दू धर्म के कई ग्रंथों में लिखे प्रसंग आपको इस बात का प्रमाण देते हैं. रामायण और महाभारत जैसी चीज़ों के होने का कारण भी पिछले जन्मों के श्राप की वजह से था. कैसे? आईए आपको इसके भी प्रमाण देते हैं.

1. विद्रशत्रा का वरदान बना उन्हीं की मौत का कारण

महाभारत में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में मारा गया था, और उस पर सबसे पहला वार किया था जयदर्थ ने. अपने पुत्र की मृत्यु के बाद अर्जुन ने शपथ ली थी कि युद्ध के अगले दिन, सूर्यास्त से पहले जयदर्थ को मार देगा और अगर ऐसा नहीं कर पाया तो ख़ुद के प्राण त्याग देगा. जयदर्थ को उसके पिता ने वरदान दिया था, जिसकी वजह से उसके बेटे का सिर ज़मीन पर गिरेगा उसका सिर उसी वक्त़ फट जाएगा और उसकी मौत हो जाएगी. भगवान कृष्ण को ये वरदान ज्ञात था. उन्होंने अर्जुन से कहा कि जयदर्थ के सिर को धड़ से अलग करें और इतनी तेज़ी से करें कि वो सिर जयदर्थ के पिता की गोद में जा गिरे. अर्जुन ने ठीक वैसा ही किया. जयदर्थ का सिर जब उसके पिता की गोद में गिरा, उस वक़्त वो ध्यान में थे. जैसे ही वो खड़े हुए जयदर्थ का सिर ज़मीन पर जा गिरा और उसके पिता का सिर उसी वक़्त फट गया और उनकी मृत्यु हो गई.

2. एक श्राप जो वजह बना कर्ण की मृत्यु का

परुशुराम को क्षत्रियों ने नफ़रत थी. उन्होंने धरती से कई बार उनका खात्मा किया, और कभी भी किसी क्षत्रिय का गुरु न बनने की कसम खाई थी. कर्ण जन्म से क्षत्रिय थे, लेकिन उन्हें ये बात पता नहीं थी. उनका पालन-पोषण शूद्रों द्वारा हुआ था. कर्ण ने परुशुराम से युद्ध की शिक्षा ली. एक बार शिक्षा के बाद परुशुराम आराम करने एक वृक्ष के नीचे लेटे और अपना सिर अपने शिष्य कर्ण की जांघ पर रख दिया. जब परुशुराम गहरी नींद में थे, तब एक बड़े से कीड़े ने कर्ण की जांघ पर काटना शुरू किया. लेकिन कर्ण ने कुछ नहीं किया क्योंकि वो अपने गुरु की नींद खराब नहीं करना चाहते थे. जब परुशुराम की नींद खुली को कर्ण की जांघ पर उन्होंने एक बहुत बड़ा घाव देखा. उन्होंने ये देखते ही कर्ण को कहा कि तुम क्षत्रिय हो और ऐसा दर्द सिर्फ क्षत्रिय झेल सकता है. इसके बाद उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि जब तुम्हें मेरी शिक्षा और दिव्य अस्त्रों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी तब तुम उन्हें भूल जाओगे. हुआ भी ऐसा ही. जब कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आए, तब कर्ण अपने ज्ञान को भूल गए और वीरगति को प्राप्त हुए.

3. क्यों होते हैं पौराणिक कथाओं में खलनायक

ब्रह्मा जी के चार पुत्र एक बार भगनाव विष्णु से मिलने बैकुंठ गए. बैकुंठ के दो द्वारपाल थे, जया और विजया. दोनो ने ब्रह्मा के पुत्रों को नहीं पहचाना और उन्हें अंदर जाने नहीं दिया. तब उन चोरों ने इन दोनों द्वारपालों को श्राप दिया की वो अपने इस दैव अवतार में नहीं रहेंगे और धरती पर आम लोगों की तरह जन्म लेंगे. इस श्राप से बचने के लिए दोनों भगवान विष्णु के पास पहुंचे. भगवान ने कहा कि वो इस श्राप को खत्म नहीं कर सकते, लेकिन इसे कम कर सकते हैं और उन्होनें दोनो को धरती पर 7 बार जन्म लेने का आशीर्वाद दिया, जिसमें वो 7 बार भगवान के दुश्मन और 7 बार भगवान के सबसे बड़े भक्त बन कर धरती पर जन्म लेंगे. पहले जन्म में हिरणकश्यपु और हिरणकश्यप, दूसरे में रावण और कुंभकर्ण, तीसरे में दंतवरका और शिशुपाल के रूप में इन दोनों ने जन्म लिया.

4. श्राप, जिस कारण औरतों के पेट में बात नहीं पचती

कर्ण कुंती के प्रथम पुत्र थे और ये बात कुंती को शुरू से पता थी. लेकिन उन्होंने समाज के डर से किसी को ये बात नहीं बताई. जब महाभारत के दौरान कर्ण की मुत्यु हुई तब कुंती ने अपने बेटों से इस बात को बताया. इस पर युधिष्ठिर ने कुंती को श्राप दिया कि आज के बाद कोई भी औरत अपने अंदर कैसा भी राज़ नहीं छिपा पाएगी. यही वजह है कि लोग औरतों को पेट का कच्चा कहते हैं.

5. अश्वत्थामा को भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया श्राप

महाभारत की हार के बाद और अपने पिता की छल से की गई हत्या से गुस्साए अश्वत्थामा ने पांडवों के बेटों को सोते वक़्त मौत के घाट उतार दिया और जब अर्जुन ने इसका प्रतिशोध लेना चाहा तो उसने ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया. इससे गुस्साए कृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वो धरती के अंत तक ज़िंदा रहेगा, इतना ही नहीं उसके शरीर पर कोढ़ हो जाएगा और उससे हमेशा बदबू आती रहेगी. हर कोई उससे घृणा करेगा. कहा जाता है कि आज भी अश्वत्थामा इस धरती पर घूम रहा है और कोढ़ी होने के कारण सब से छिप कर ज़िंदगी जी रहा है.

6. राम का सीता से अलग होना

रावण अपनी तपस्या के लिए विख्यात था. एक बार रावण की मां अपने बेटे के वरदान के लिए तप कर रहीं थी. तभी इंद्र ने वहां आकर शिवलिंग को नष्ट कर दिया. जिसके बाद रावण को गुस्सा आ गया और उसने तप किया कि शिवलिंग की जगह वो अपनी मां के लिए धरती पर भगवान शिव को ले आएंगे. रावण ने तप करना शुरू किया, जिससे देवी पार्वती को डर लगा कि अगर शिव चले गए तो वो अकेले रह जाएंगी. उन्होंने मदद के लिए भगवान विष्णु को बुलाया. जब रावण शिव से वरदान में उन्हें मांगने वाला था तभी विष्णु भगवान ने उसकी जीभ घुमा दी और रावण गलती से माता पार्वती को मांग बैठा. इस बात से गुस्साई पार्वती जी ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वो भी अपने अवतार में अपनी पत्नी के लिए दर-दर भटकेंगे और उन्हें अपनी पत्नी को हासिल करने के लिए इसी रावण से युद्ध करना होगा. इसी श्राप की वजह से सीता का हरण रावण ने किया और राम उनसे अलग रहे.

7. शिव की पूजा लिंग के रूप में क्यों

वरदान और श्राप देने वाले भी इन श्रापों को झेलते हैं. ऐसा ही हुआ था भगवान शिव के साथ. एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती एक साथ अपने कमरे में थे. ऋषिमुनी भिर्गु शिव से मिलने उनके घर पहुंचे. उन्होंने दरवाजे पर कई बार दस्तक दी, लेकिन शिव ने दरवाजा नहीं खोला. जिससे गुस्साए ऋषिमुनी भिर्गु ने शिव को श्राप दिया की आने वाले वक़्त में कोई भी उनके असली रूप को नहीं पूजेगा और हमेशा ही उनके लिंग की पूजा की जाएगी.

8. रामायण और महाभारत के होने का कारण भी एक श्राप था

एक वक़्त की बात है. जब देवताओं और असुरों के युद्ध ने कोहराम मचाया हुआ था. इस युद्ध में सबसे ज़्यादा नुकसान असुरों को होता. देवताओं के हाथों कई असुर मारे जाने लगे. असुरों की संख्या कम होने लगी. इस विपदा से निकलने के लिए असुर गुरू शुक्राचार्य ने एक मंत्र की रचना की जिसे नाम दिया 'मृतसंजीवनी'.
इस मंत्र के उपयोग से मरे हुए असुर ज़िंदा होने लगे. तब भगवान विष्णु ने एक चाल चली और मरे हुए असुरों को अपने शरीर में समाना शुरू किया. ये देख शुक्राचार्य की मां ने उन्हें ऐसा करने से मना किया. उनके मना करने और विष्णु भगवान के काम में बाधा बनने के कारण भगवान विष्णु को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उनकी मां का गला काट दिया. जब ये बात शुक्राचार्य के पिता को पता चली तब उन्हों भगवान विष्णु को ये श्राप दिया कि उन्हें भी धरती पर बार-बार जन्म लेना पड़ेगा और जीवन मृत्यु के चक्र को बार-बार झेलना पड़ेगा. इसी श्राप के कारण राम और कृष्ण ने धरती पर जन्म लिया और रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं हुईं.

9. नरसिम्हा का जन्म

राक्षस हिरणकश्यप ने घोर तप से ब्रह्मा जी से वरदान हासिल किया था, और वो वरदान कुछ इस तरह था
उसे न तो कोई इंसान मार सकता है न ही कोई जानवर
ब्रह्मा द्वारा जन्मा कोई भी उसकी मौत का कारण नहीं बनेगा
न ही कोई भगवान उसे मार सकता है न ही धरती पर जन्म लेने वाले जीव जन्तु
न रात में न दिन में उसकी मौत होगी
न ही अंदर और न ही बाहर उसकी मौत होगी
न ही कोई हथियार उसे मार सकता है नहीं ब्रह्मा खुद

इस वरदान को हासिल करने के बाद हिरणकश्यप को मारना लगभग नामुमकिन हो गया. देवताओं के बीच उसका आतंक बढ़ने लगा. उसने पूजा पर रोक लगा दी. जो भी हरि का नाम लेता, हिरणकश्यप उसे जान से मार देता. यहां तक की उसने अपने बेटे को भी मारने की कई बार नाकाम कोशिश की.

तब भगवान विष्णु ने नरसिम्हा के रूप में अवतार लिया
वो आधे इंसान थे और आधे शेर
वो खुद बने ब्रह्मा द्वारा पैदा नहीं हुए
उन्होंने हिरणकश्यप को दोनों पहर के बीच मारा. यानि... शाम को. न तो वो सुबह थी, न ही रात.
हथियार की जगह उन्होंने अपने नाखूनों को इस्तेमाल किया
हिरणकश्यप को नरसिम्हा भगवान ने घर की दहलीज़ पर मारा , वो न तो अंदर था न बाहर.

10. कुत्ते क्यों करते हैं सड़को पर संभोग

हम सब जानते हैं कि द्रोपदी के पांच पति थे. पांडव बारी-बारी द्रोपदी के साथ समय बिताते थे. कोई किसी और की वक़्त बाधा न बने, इसके लिए पांडवों ने एक तरकीब निकाली, जो भी द्रोपदी के कमरे में होगा वो अपनी चप्पल कमरे के बाहर उतारेगा, जिससे दूसरों को पता चलेगा कि कोई एक द्रोपदी के साथ कक्ष में है. एक बार पांचों भाईयों में से एक द्रोपदी के साथ थे. उसी वक़्त वहां भीम पहुंच गए और कोई चप्पल न देख वो कमरे में प्रवेश कर गए. उस वक़्त द्रोपदी को दूसरे भाई के साथ देख भीम हैरान रह गए. द्रोपदी ने भीम से पूछा तो उन्होंने कहा कि बाहर कोई भी चप्पल नहीं थी. खोज के बाद पता चला कि वहां रखी चप्पल कुत्ता उठा ले गया था. इसके बाद द्रोपदी ने कुत्तों को श्राप दिया कि वो जब भी संभोग करेंगे वो अकेले नहीं, बल्कि दुनिया के सामने करेंगे.