किसी भी क्लब या पब में जाइए म्यूजिक, मस्ती और फन के अलावा एक चीज़ हर जगह कॉमन देखने को मिलती है, वो है बड़े-बड़े डोलों वाले लम्बे-तगड़े बाउंसर. इन बाउंसरों की एक गुस्से वाली निगाह से ही सारी मस्ती और फन ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बिल्ली को देख कर चूहा गायब हो जाता है. शक्ल और सूरत से ये सारे बाउंसर हरियाणा के जाट ही लगते हैं, हो भी क्यों न हरियाणा वीरों की जन्म भूमि जो रही है. आज हम आपको हरियाणा के दो ऐसे गांव के बारे में बता रहे हैं, जिसका काम ही बाउंसरों को पैदा करना है.

दक्षिणी दिल्ली से सटे हरियाणा के फतेहपुरी के पास है बेरी और असोला गांव, जहां सुबह होने के साथ ही क्या बच्चे और क्या नौजवान, सभी अखाड़ों में पसीना बहाते हुए नज़र आते हैं.

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50 लोगों का यह समूह अखाड़े में 2 घंटे की मेहनत में 200 से ज़्यादा दंड लगाता है. उसके अलावा 200 उठक-बैठक लगाने के बाद अपने कंधों को मजबूत करने के लिए ईंटों के साथ-साथ कभी-कभी दोस्तों को भी उठाते हैं.

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दिल्ली के अधिकतर क्लबों और होटलों में सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले बाउंसर हरियाणा के इसी गांव से सम्बन्ध रखते हैं. भारतीय रेसलिंग टीम के सदस्य विजय तंवर भी इसी गांव से सम्बन्ध रखते हैं. यह कहना गलत नहीं होगा युवाओं में रेसलिंग के प्रति लगाव की नीवं उन्हीं के द्वारा रखी गई है. वो इस बात को स्वीकार भी करते हैं कि वो अपने गांव से बाउंसर का काम करने वाले पहले व्यक्ति रहे हैं.

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उन्हीं के नक़्शे-क़दमों पर चलते हुए उनके भाइयों ने अखाड़े में जाना शुरू किया. उसके बाद लोग उनसे जुड़ते रहे और कारवां बनता गया. इस गांव की सबसे कमाल की बात यह है कि यहां कोई जिम नहीं है.

अखाड़े में जाना वाला कोई भी व्यक्ति स्मोक या ड्रिंक नहीं करता, इसके अलावा खुद को बुरी आदतों से दूर रख कर खुद को संयमित रखता है. इन लोगों की डाइट में कई किलो दूध, दही और घी के अलावा फल और ड्राई-फ्रूट्स शामिल हैं.

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यहां से मस्क्युलर बॉडी बनाने के बाद ये लोग दिल्ली का रुख करते हैं और 50,000 महीने की पगार पर क्लबों और होटलों के सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं.

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तो भइया अगली बार किसी क्लब में जायें और कोई बाउंसर दिखे तो राम-राम कहना न भूलें.

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