राजधानी दिल्ली से एक दिल-दहला देने वाली घटना सामने आई है. सीलमपुर की एक जींस फैक्ट्री में छोटे-छोटे बच्चों पर भयानक टॉर्चर को अंजाम दिया जा रहा था. 8 से 13 साल के इन बच्चों को दिन में 22 घंटों तक काम करवाया जाता था.

इन सब की उम्र 8 से 13 साल के बीच है. इन 26 बच्चों को कैलाश सत्यार्थी के एनजीओ 'बचपन बचाओ आंदोलन' के कार्यकर्ताओं ने छुड़ाया है. कैलाश बच्चों के लिए किए जा रहे अपने अद्भुत प्रयासों के चलते नोबेल पुरस्कार से भी नवाज़े जा चुके हैं.

ये सभी बच्चे बिहार के मोतिहारी ज़िले से अगवा किए थे और पिछले चार सालों से एक जींस फैक्ट्री में काम कर रहे थे. इन बच्चों को डेनिम जींस से थेड्र को काटना होता था और दस पीस को दस मिनट में पैक करना होता था.

जो बच्चा सबसे आखिरी में काम पूरा करता था, उसे हथौड़ों की मार पड़ती थी. नाममात्र का खाना और टारगेट पूरा न होने पर भी हथौड़ों से पिटाई की जाती थी. अगर थकावट के कारण कोई बच्चा सोता पाया गया, तो उसे बाथरूम में बंद कर दिया जाता या खाना नहीं मिलता था.

जब इन्हें फैक्ट्री से छुड़ाया गया तो ज़्यादातर बच्चों की हालत नाज़ुक पाई गई. कुछ ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे और कुछ को आंखें खोलने में दिक्कतें आ रही थी क्योंकि उन्होंने सालों बाद सूरज की रौशनी देखी थी.

इन बच्चों को सुबह पांच बजे सोने को मिलता था और 7 बजे उठा दिया जाता था, अगर कोई नहीं उठता, तो उसे हथौड़ों से पीटकर उठा दिया जाता. पिछले चार सालों से इन लोगों को सिर्फ़ चावल और आलू खाने को मिल रहा था. अत्यधिक काम के चलते जब इन्हें नींद आने लगती थी तो कटर, हथौड़ों, यहां तक की करेंट के झटके तक दिए जाते थे.

10 साल के लकी ने बताया कि हम लोगों को एक छोटे से कमरे में रखा गया था और हमने सालों से इतना उजाला नहीं देखा था. मैं इतनी रौशनी का आदी ही नहीं था. हम लोगों को नहाने नहीं दिया जाता था. हर रोज़ हमें 5000 जींस पैक करनी होती थी.

इन बच्चों को छुड़ाने के बाद एक चिल्ड्रन होम में लाया गया. इसे Childline नाम की एनजीओ चलाती है और इन्हें मेडिकल उपचार उपलब्ध करा दिया गया है.

एनजीओ के एक सदस्य के मुताबिक, इनकी रिपोर्ट्स में सामने आया है कि इनके सिर और माथे के अलावा छाती, पैरों और कमर पर भी चोट के निशान है. टॉर्चर की ये कहानी बयां करती है कि देश में बाल मज़दूरी के हालातों में ख़ास बदलाव नहीं आया है.

Source: Metro