उसकी उम्र में बच्चों की आंखों में हज़ार सपने पला करते हैं, उसकी आंखों में भी थे. जब मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले रही थी, तो सोचती होगी उसके IPS बनने के सपने को पूरा करने में ये काम आएगा. नहीं पता था कि अभी ही इस ट्रेनिंग को इस्तेमाल करने की नौबत आ जाएगी, वो जूझती रही. रिपोर्टों की मानें तो आधे घंटे तक उसने उन हैवानों का सामना किया, पर फिर उसे हारना पड़ा, अपने भाई और पिता के सिर पर बन्दूक रखी देखकर. जब वो हैवान उससे तंग आ गए तो इसी कायरता पर उतर आये.

एनएच-91 के पास 29 जुलाई की रात मां और उसकी 14 साल की नाबालिग बेटी से गैंगरेप किया गया. वो रात ये परिवार कभी नहीं भूल पायेगा. सामूहिक दुष्कर्म की शिकार 14 वर्षीय लड़की ने पिछले साल 8वीं कक्षा में 86 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. वो आईपीएस अधिकारी बनना चाहती थी.

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परिवार के किसी व्यक्ति की जान नहीं गयी पर, उन 3 घंटों में हज़ार मौत मरा होगा वो बेबस पिता जो अपनी बेटी और अपनी पत्नी की हिफाज़त न कर सका, वो भाई भी मरा होगा जिसने अपनी आंखों के सामने अपनी मां और बहन की इज्ज़त लुटते देखी. बलात्कार का असर सिर्फ पीड़िता पर ही नहीं होता, उसके घरवालों के मन में भी कभी न मिटने वाली टीस छोड़ जाता है. एक बलात्कार का दर्द पूरा परिवार झेलता है, बस लड़कियां ही खतरे में हैं, ऐसा नहीं है. वो बदनसीब बाप कोई भी हो सकता था, वो बदनसीब भाई कोई भी हो सकता है.

गैंगरेप को लेकर की जा रही राजनीति और मीडिया के बार-बार बयान मांगने की निंदा करते उसकी मां ने कहा कि वह इस सब से थक चुकी हैं. उनके जख्म तभी भरेंगे, जब आरोपियों को कड़ी सजा मिलेगी. गैंगरेप का शिकार हुई युवती की मां ने कहा है कि वो गुनहगारों को अपने हाथों से फांसी देना चाहती है.

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उन्हें लगता है कि अब वो कभी एक आम ज़िन्दगी नहीं जी पाएंगे. घर के लोग एक-दूसरे का सामना करने से भी बच रहे हैं, उस रात उनके साथ जो हैवानियत हुई, उसे भुला पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है.

उनका कहना है कि उन दरिंदों के पकड़े जाने पर भी उनके ज़ख्म पूरी तरह नहीं भर सकते, पर यदि उन्हें नहीं पकड़ा गया तो वो मर ज़रूर जायेंगे.

इस घटना ने परिवार को इस हद तक तोड़ दिया है कि वो अल्टीमेटम दे चुके हैं कि 3 महीने में इंसाफ नहीं मिला तो परिवार अपनी जान दे देगा. पुलिस ने तीन महीने में आरोपियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का वादा किया है.

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एक बार फिर गैंगरेप की इस घटना से देश सन्न है, नेताओं में बयानबाज़ी का दौर चल रहा है. पुलिस और प्रशासन की थू-थू तो हो ही रही है. निर्भया कांड के समय भी देश आक्रोशित था, लगा जैसे शायद अब ये घिनौनी घटनाएं रुक जायेंगी. समाज और प्रशासन कोई सबक लेगा, पर इस घटना ने फिर हमारे सामने ला कर रख दिया है इस देश की शर्मनाक सच्चाई को. यहां बेटियां आज भी सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि हमारे ही बीच घूमते इंसान के भेष में ये जो भेड़िये हैं, इनके लिए लडकियां बस मांस की एक बोटी होती हैं, जिसे मौका मिलते ही ये नोच डालना चाहते हैं.

वो चुलबुली बच्ची जो कल तक अपने घर में चहचहाती रहती थी, आज उसके मुंह से एक शब्द नहीं निकल रहा है. वो स्तब्ध है. स्तब्ध है उसके साथ हुई हैवानियत से. जिस डॉक्टर ने उसकी जांच की, उसके असंवेदनशीलता भरे अनुचित सवालों से. स्तब्ध है वो उस मीडिया के रवैये से, जो उसके घर के बाहर भीड़ लगाए है. उन ज़िम्मेदार रिपोर्टरों से, जो उसके पिता से पूछते हैं कि 'जब आपकी आंखों के सामने आपकी बेटी की इज्ज़त लूटी जा रही थी और वो पापा! पापा! चिल्ला रही थी, तो क्या आपको गुस्सा आ रहा था? बेबसी हो रही थी?'

शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो इस संवेदनशील घटना को TRP पाने का माध्यम बना रहे हैं और उन नेताओं को भी जो इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहे हैं.

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