राम रहीम को सीबीआई कोर्ट द्वारा सज़ा सुनाने के साथ ही पुराने गड़े-मुर्दों का उखड़ना शुरू हो गया है, जहां हर दिन उन पर नए-नए ख़ुलासे होने लगे हैं. ऐसा ही एक खुलासा सीबीआई के पूर्व अधिकारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ले कर भी किया है.

दरअसल सीबीआई के तत्कालीन चीफ़ इंवेस्टिगेटिंग ऑफ़िसर, DIG एम. नारायणन ने खुलासा किया है कि डेरा प्रमुख के ख़िलाफ़ जांच करते समय उन पर हरियाणा और पंजाब के नेताओं द्वारा दवाब बनाया जा रहा था कि वो मामले को नर्मी के साथ लें. इस बाबत जब सीबीआई चीफ़ ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात की, तो उन्होंने सभी राजनीतिक दवाबों को दरकिनार करते हुए सीबीआई को पूरी आज़ादी दी कि वो कानून के दायरे में रह कर अपनी जांच करें.

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इस बाबत एम. नारायणन ने पूर्व सीबीआई चीफ़ विजय शंकर को ले कर भी ख़ुलासा किया कि 'उन्होंने भी इन MPs के दवाब में आये बिना जांच के लिए आदेश दिए.' जिस समय सीबीआई की विशेष अदालत ने अपना फ़ैसला सुनाया उस वक़्त नारायणन मैसूर के अपने घर में ख़बरों पर नज़र रखे हुए थे. अदालत के फ़ैसले पर वो काफ़ी संतुष्ट नज़र आये और साथ ही कहा कि अभी उन पर अन्य मामलों में सज़ा होनी बाकी है, जिनमें हत्या के भी दो मामले शामिल हैं.

जांच के बारे में नारायणन कहते हैं कि 'मामला 2002 में एक गुमनाम चिट्ठी के ज़रिये सामने आ गया था, पर 2007 तक कोई एक्शन नहीं लिया गया था. हरियाणा-पंजाब हाई कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई चीफ़ विजय शंकर को तलब किया गया और उनसे रिपोर्ट मांगी गई, जहां उन्होंने साध्वी के ख़त के साथ पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरा के एक सेवादार रंजीत सिंह की हत्या के बारे में बताया. इसके बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि वो अपनी जांच केवल 57 दिनों में पूरी करे.'

नारायणन आगे कहते हैं कि 'ये इतना आसान नहीं था, जितना हम समझ रहे थे. गुमनाम ख़त के आधार पर जब हम जांच करने पहुंचे, तो हमें पता चला कि 1999 से ले कर 2002 तक करीब 200 से ज़्यादा यौन उत्पीड़न का शिकार हुई 200 साध्वियां डेरा छोड़ कर जा चुकी थीं. इनमें से हम सिर्फ़ 10 साध्वियों तक पहुंचने में कामयाब हो पाए थे, पर लगभग सबकी शादी हो चुकी थी और बदनामी के डर से कोई सामने नहीं आना चाहती थी. आखिरकार हमने दो साध्वियों को रिपोर्ट दर्ज़ करने के लिए राज़ी किया और 56वें दिन अंबाला कोर्ट में चार्जशीट दायर की.'

नारायणन के मुताबिक, डेरे के अंदर जाना भी अपने-आप में मुश्किल काम था. चारों तरफ़ से किलेबंदी की गई थी. बाबा के गुंडे सीबीआई के अधिकारियों को खुलेआम धमकियां दे रहे थे और बाबा का आश्रम मध्यकाल की किसी सल्तनत की तरह था, जिसके चारों ओर ख़ूबसूरत साध्वियों का पहरा था. नारायणन कहते हैं कि 'बाबा एक शातिर अपराधी था, जो अपने अपराध का कोई सबूत नहीं छोड़ता था. उसके कमरे में कंडोम का एक अच्छा-खासा कलेक्शन था. एक तरह से कहूं, तो वो एक पागल था.'

2009 में सीबीआई से रिटायर्ड हुए नारायणन का कहना है कि 'रंजीत सिंह डेरे का एक समर्पित सेवादार था, पर जब उसे अपनी बहन के साथ हुए बलात्कार के बारे में पता चला, तो वो अपनी बहन के साथ सिरसा छोड़ कर घर आ गया. इसके कुछ दिनों बाद ही एक गुमनाम चिट्ठी प्रधानमंत्री और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट पहुंची, जिसमें बाबा की सच्चाई को उजागर किया गया था. इस चिट्ठी के बारे में बाबा और उसके समर्थकों को शक था कि इसके पीछे रंजीत का हाथ है, जिसके बाद उसकी भी हत्या करवा दी गई. ये भी साबित हो चुका है कि जिस रिवोल्वर से रंजीत की हत्या की गई, वो डेरे के मैनेजर की ही थी. इसके अलावा अपराध वाली जगह पर डेरे का Walkie-Talkie भी मिला है. मुझे पक्का यकीन है कि इन मामलों में भी बाबा को सज़ा होनी चाहिए.'

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