क़रीब पचास साल पहले केरल के ज़िले 'त्रिशूर' की पहाड़ियों में बसा छोटा सा गांव 'मरोत्तिचल', शराब और जुए की लपेट में जकड़ा हुआ था. शाम होती नहीं थी कि लोग सड़कों पर लुढ़कते दिखने लगते थे. शराब, बेरोज़गारी और जूए की लत ने कई घरों की रौशनी बुझा दी थी. दो वक़्त की रोटी वहां की महिलायें सुकून से नहीं खा सकती थीं, क्योंकि शाम होते ही वहां के पुरुष हिंसा पर उतर आते थे. महिलायें पिटती थीं, लेकिन उन्हें बचाने कोई नहीं आता था. नशे में धुत इंसान जब ख़ुद को नहीं बचा पाता तो कोई और उससे उम्मीद भी क्या करता. लेकिन ये सब अब इतिहास हो गया है.

अब इन लोगों के सिर पर शराब, नहीं शतरंज का नशा चढ़ा रहता है.

यहां के बच्चे जैसे ही 10 से 15 साल की उम्र में पहुंचते हैं शतरंज में महारत हासिल कर लेते हैं. अब यहां के लोग इस खेल में इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास शराब पीने का वक़्त ही नहीं होता.

1970 से 80 के दशक में नशे ने इस गांव को तबाह कर दिया था. बच्चे-बूढ़े और जवान सब नशे के आदी हो चुके थे. गांव तबाह हो रहा था. उसी गांव के सी. उन्नीकृष्णन को ये बात खटक रही थी. वे नहीं चाहते थे कि उनका गांव नशे की ज़द में बर्बाद हो जाए.

उस वक़्त उन्नीकृष्णन दसवीं में पढ़ रहे थे. उन्होंने अमेरिका के 16 वर्षीय चेस ग्रैंडमास्टर Bobby Fischer से प्रभावित होकर चेस सीखने का मन बनाया. पड़ोस के गांव में जाकर वे चेस सीखते और गांव वालों को सिखाते. देखते-देखते चेस उनके गांव का सबसे पसंदीदा खेल बन गया. लोगों पर शतरंज का नशा ऐसा चढ़ा कि शराब का नशा भूल गए.

अब उन्नीकृष्णन 59 बरस के हैं. उन्होंने 600 से ज़्यादा लोगों को चेस खेलना सिखाया है. उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में ख़ूब मेडल झटके हैं.

उन्नीकृष्णन 'मरोत्तिचल' गांव में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. उनकी दुकान पर गांव भर के शतरंज खिलाड़ी जुटे रहते हैं.

इस गांव में शतरंज के खिलाड़ी आठ साल के छोटे से बच्चे लेकर अस्सी साल के बूढ़े भी हैं.

जनवरी 2016 में Chess Association of Marottichal से 700 सदस्य जुड़े . इसी के साथ इस गांव के नाम एक समय में हज़ार से ज़्यादा खिलाडियों के शतरंज खेलने का एशियन रिकॉर्ड भी हो गया.

नशे की गिरफ़्त में जकड़ा ये गांव नशे को हरा चुका है. इस गांव ने नशे को हमेशा के लिए Checkmate दे दिया है.