छठ पर्व वैसे तो एक ऐसा त्यौहार है जो मुख्यत: बिहार प्रदेश और उत्तर प्रदेश के भोजपुरी बोले जाने वाले इलाके में प्रचलित है. मगर जैसे-जैसे भोजपुरी-मैथिला-वज्जिका बोलने वाले और बिहार, उत्तर प्रदेश के लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचने लगे वैसे-वैसे यह आस्था का महापर्व भी देशों की सीमाएं लांघ कर आज एक वैश्विक त्यौहार हो गया है. हिन्दू पर्व और सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व आज विश्व भर में सबसे प्रचलित और प्रसिद्ध त्यौहार के तौर पर स्थापित हो चुका है. प्रकृति के सबसे नज़दीकी इस उत्सव के कई पक्ष हैं, तो आइए आपको रूबरू कराते हैं छठ पूजन के कुछ पक्षों से...

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यह पर्व सूर्य की आराधना का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है...

छठ के नाम से चर्चित यह त्यौहार साल में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक माह में. चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ को चैती छठ और कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ को कार्तिकी छठ को मनाया जाता है. वैसे देश-दुनिया में ज़्यादा धूम कार्तिक के छठ के ही दौरान देखने-सुनने में आती है.

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लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देवता और छठी मइया भाई-बहन हैं...

सूर्य वैसे तो पृथ्वी पर ज़िंदगी को चलायमान रखने में सबसे बड़ा कारक है. हिन्दू धर्म के तमाम ग्रंथों और महाकाव्यों के अलावा अमूमन सारे धर्मों के प्रमुख किताबों में सूर्य को बहुत ऊपर का दर्जा प्राप्त है. हिन्दू धर्म के वेदों में भी सूर्य का देवता के रूप में उल्लेख मिलता है. तो वहीं कई लोककथाओं में सूर्य और छठी मइया को भाई-बहन कहा जाता है...

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'छठ' दुनिया के सबसे कठिनतम और जटिल त्यौहारों में से एक है...

इस त्यौहार के दौरान साफ-सफाई की ख़ास व्यवस्था करनी होती है. छठ के दौरान व्रती को चार दिनों तक लगातार उपवास करना होता है. भोजन त्यागने के साथ-साथ आरामदेह बिस्तर का भी त्याग करना पड़ता है. छठ पूजन की तैयारी के दौरान व्रती बिना सिलाई किए हुए कपड़े पहनते हैं. वैसे तो इस उत्सव में महिलाओं की संख्या ज़्यादा होती है मगर पुरुष भी इस पर्व में बराबर के सहभागी होते हैं. इस पर्व को लेकर ऐसी भी मान्यताएं हैं कि पुत्र की चाहत और संतान की कुशलता हेतु भी यह पूजन किया जाता है.

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यह डूबते सूर्य और उदीयमान सूर्य का उत्सव है...

अमूमन देखा जाता है और ऐसी कहावत भी हमारे समाज में प्रचलित है कि उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं. मगर छठ पूजन के दौरान कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य को सांध्य अर्घ्य दिया जाता है. इसका मतलब निकलता है कि हम एक मानव के तौर पर अंधेर में भी उजाले के लिए प्रतीक्षारत होते हैं. कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह व्रती उदीयमान सूर्य को जल और दुग्ध अर्पित करते हैं. उनका ऐसा मानना है कि ऐसा करने से सूर्य तमाम तरह के रोग और व्याधियों को हर लेता है.

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सूर्य पूजन का अलग संदर्भ...

वो कहते हैं न कि सृष्टि के केन्द्र में शक्ति ही है, और छठ पूजन के केन्द्र में भी शक्ति का ही अप्रतिम स्वरूप है. सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्त्रोत उनकी पत्नियां ऊषा और प्रत्यूषा हैं. छठ के दौरान सूर्य के साथ-साथ इनकी भी पूजा-अर्चना होती है. प्रात वेला में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायं काल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य और नमन किया जाता है.

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पौराणिक और लोककथात्मक संदर्भ...

लोकमान्यताओं के अनुसार छठ राम चंद्र जी ने लंका विजय के पश्चात् रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को माता सीता और राम चंद्र ने सूर्य देवता की अराधना की थी. उन्होंने सप्तमी को सूर्योदय के समय पुन: अनुष्ठान कर सूर्य देवता से आशीर्वाद प्राप्त किया था.महाभारत की मानें तो सूर्य पुत्र कर्ण भी सूर्य का अनन्य उपासक था. जिसकी वजह से उसी ख़ासी शक्तियां प्राप्त थीं. तो वहीं कई कथाओं में द्रोपदी के भी सूर्योपासना की चर्चा सुनी जाती है.

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सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व...

छठ पूजन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी सादगी-पवित्रता और लोकपक्ष है. भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस त्यौहार में किसी पंडा-पुरोहित की ज़रूरत नहीं होती. यह समाज की समरसता और भाई चारे का भी प्रतीकपर्व है जिसमें ऊंच-नीच भूला कर सभी ईश्वर की छत आसमान के नीचे चले आते हैं. यह त्यौहार प्रकृति के निकटतम त्यौहारों में शुमार किया जाता है क्योंकि इसमें बांस से निर्मित सूप, डलिया और मिट्टी के बरतनों के साथ-साथ गुड़, चावल और गेंहू से निर्मित प्रसाद चढ़ाए जाते हैं. इस पूरे उत्सव के दौरान माताओं-बहनों द्वारा गाए जाने वाले गीत तो बस धरती पर स्वर्ग का अहसास कराते हैं...

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