जम्मू-कश्मीर में पिछले हफ़्ते ही निकाय चुनाव के परिणाम घोषित हुए. जहां भाजपा ने श्रीनगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन पर कब्ज़ा जमाया, निर्दलयी कैंडिडेट्स ने श्रीनगर नगर निगम पर जीत हासिल की. लेकिन हम एक राज्य के नगर निगम चुनाव के Results की बात क्यों कर रहे हैं?

वो इसलिए क्योंकि इस चुनाव में नाम मात्र के वोट पड़े थे और 8 वोट मिलने वाले कैंडिडेट को भी जीता हुआ मान लिया गया.

घाटी में चुनाव के क्या मायने थे ये वहां के वोट प्रतिशत से साफ़-साफ़ दिखता है. वहां पहले चरण में 83 वार्डों में हुए मतदान में मात्र 8.3 प्रतिशत लोगों ने वोट दिए, दूसरे चरण में हुए मतदान में भाग लेने वाल वोटरों की संख्या 3.4 प्रतिशत थी. तीसरे चरण में 3.49 प्रतिशत और अंतिम चरण में 4.2 प्रतिशत वोट पड़े.

घाटी में कुल 598 वार्ड हैं, उनमें से 172 वार्डों पर एक भी उम्मीदवार नहीं खड़ा था. 190 वार्डों पर सिर्फ़ एक उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा था, यानी कि किसी और को वोट देने का विकल्प भी नहीं था. ये अधिकांश वो इलाके हैं, जिन्हें आतंकवाद प्रभावित कहा जाता है.

राजधानी श्रीनगर में क्या हालत थी, ये वहां के कुछ वार्डों के चुनाव परिणाम से समझ जाएंगे.

वार्ड नंबर 74

कुल मतदाता- 5,118 कुल वोट-09

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वार्ड नंबर 39

कुल मतदाता- 6,805 कुल वोट- 136

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वार्ड नंबर 71

कुल मतदाता- 9521 कुल वोट- 73

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वार्ड नंबर 1

कुल मतदाता- 9907 कुल वोट- 312

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वार्ड नंबर 29

कुल मतदाता- 9151 कुल वोट- 116

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कुल मिलाकर श्रीनगर में सभी वार्ड के यही हालात थे. पोलिंग बूथ मतदाताओं की राह ताक रहे थे लेकिन कोई अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए घर से बाहर नहीं निकल रहा था.ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वहां की दो मुख्य स्थानीय पार्टियों ने इस चुनाव का बहिष्कार किया था.

फ़ारुख़ अब्बदुला की नेशनल कांफ्रेंस और महबूबा मुफ़्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अनुछेद 35A पर उठी तनातनी की वजह से इस चुनाव का बिहष्कार किया था. इस वजह से घाटी में हिंसा का माहौल भी बना हुआ था. कई जगह टकराव भी हुए. आलम ये था कि कई वार्ड में चुनावी प्रत्याशियों के नाम तक उजागर नहीं किए गए थे.

हालत जैसे भी थे, चुनाव संपन्न हुए. अब इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबना कहिए ये लूप होल. जिस सीट पर सिर्फ़ एक उम्मीदवार खड़ा था और उसने सिर्फ़ ख़ुद को वोट दे दिया तब भी वो विजेता कहा जाएगा और वार्ड पार्षद कहलाने योग्य होगा.

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