बचपन से ही हम सुनते और पढ़ते आए हैं, 'भारत एक कृषि प्रधान देश' है. यहां की 70 प्रतिशत आबादी खेती पर आश्रित है. हालांकि, अब ये संख्या 60 प्रतिशत हो गई है, पापा के समय में यही संख्या 80 प्रतिशत और दादा जी के समय में 90 प्रतिशत थी. एक समय था, जब पूरा हिन्दुस्तान खेती पर ही आश्रित हुआ करता था. सवाल ये नहीं है कि कितनी आबादी खेती कर रही है, सबसे अहम सवाल ये है कि खेती से कितने किसान ख़ुश हैं? एक तरफ देश में लोग भूख से मर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रति वर्ष 670 लाख टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हो रहा है. देखा जाए, तो सरकार के पास अन्न भंडारण की सुविधा नहीं है. इस वजह से किसानों को सस्ते दामों में अनाज को बेचना पड़ रहा है.

सरकारी आंकड़ों की मानें, तो खाद्य पदार्थों की जितनी बर्बादी इस देश में प्रतिवर्ष हो रही है, उससे पूरे बिहार की आबादी को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि अनाज की बर्बादी की जानकारी सरकार को नहीं है, मगर सरकार इस दिशा में काफ़ी उदासीन है. इस देश का सबसे अहम सवाल ये है कि देश में अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कमी नहीं है, फिर भी लोग भूख से क्यों मर रहे हैं?

ऐसा नहीं है कि इस आर्टिकल में मैं सिर्फ़ सरकार से सवाल ही करुंगा. इससे निपटने के लिए कई सुझाव भी देने की कोशिश करुंगा. शायद आपको अहसास भी नहीं होगा कि अन्न भंडारण से हम देश में कई समस्याओं को सुलझा सकते हैं. कई नौकरियां पैदा कर सकते हैं, देशवासियों को आर्थिक रुप से सशक्त कर सकते हैं.

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भारत सरकार के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के मुताबिक, उचित भंडारण की कमी से देश के किसानों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. अगर खाद्यान्न की बर्बादी को रोकना है और किसानों को प्रोत्साहित करना है, तो देश के सभी प्रांतों में उचित भंडारण की सुविधा होनी चाहिए.

खाद्य भंडारण देश की ज़रूरत है

खाद्य वस्तुओं की बर्बादी का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है. यह भारतीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा रहा है. इससे जहां एक तरफ महंगाई बढ़ रही है, वहीं किसानों को निवेश पर लाभ तो क्या, लागत भी वसूल नहीं हो पा रही है.

खाद्य भंडारण पर सरकार की सोच

2013 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में कुल खाद्यान्न उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद होता है. भारत के 120 जिलों में अध्ययन के बाद पाया गया कि भंडारण के अभाव में काफी खाद्य पदार्थ उत्पादन के बाद बर्बाद हो रहा है.

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान इस मुद्दे पर कहते हैं कि 'जहां तक अनाजों के भंडारण क्षमता का सवाल है, इसमें किसी तरह की कोई कमी नहीं है तथा आगे इसे और बढ़ाने के उपाय भी किए जा रहे हैं.'

किसानों को जागरूक करने की ज़रूरत है

ऐसा नहीं कि देश के किसानों को अन्न भंडारण की जानकारी नहीं है. पुराने समय में लोग मिट्टी के बर्तनों में अन्न रखते थे. ये सिलसिला अभी तक बरकरार है. मगर सब्जियों के लिए ये जगह माकूल नहीं है. ऐसे में केंद्र सरकार को इन बातों पर ग़ौर करने की ज़रुरत है.

क्यों बर्बाद होता है अनाज?

सरकार कहती है कि अनाज भंडारण के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं, इसके बावजूद बाढ़, वर्षा या आग तथा भंडार गृहों में लीकेज और कीटों के प्रकोप से कई बार खाद्यान्नों को क्षति पहुंचती है. अंत में वह इस्तेमाल योग्य नहीं रह जाते हैं.

भंडारण न हो तो क्या होगा?

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले 15 सालों में हर साल किसी एक खाद्य वस्तु की महंगाई ने देश की जनता को काफी रुलाया है. कभी प्याज महंगा हो गया, तो कभी टमाटर. अब तो हाल ये है कि दालों ने आम जनता को रुला दिया है. इतना होने के बावजूद सरकार का इस पर कोई ध्यान नहीं गया. उचित मूल्य और भंडारण के अभाव में किसानों ने देश में दालों की खेती ही छोड़ दी. अगर भंडारण की सुविधा नहीं होगी, तो हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

हम ऐसे अनाज भंडारण कर सकते हैं

  • रेलवे स्टेशनों के खाली पड़े प्लेटफॉर्मों पर Cold Storage की सुविधा दी जा सकती है. वहां बिजली की उपलब्धता, संचार की व्यवस्था और परिवहन की पहुंच के कारण अनाज सुरक्षित और स्वस्थ अवस्था में रहेंगे.
  • ब्लॉक स्तर पर भी Cold Storage की सुविधा दी जा सकती है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि इस पर सरकारी अफ़सर लापरवाही भी नहीं कर सकते हैं. जन वितरण प्रणाली के तहत, आम लोगों का अनाज सुरक्षित रह सकता है.
  • प्रत्येक गांवों के पंचायत भवनों में सौर ऊर्जा की मदद से Cold Storage की व्यवस्था की जा सकती है. ग्राम सेवक और ग्राम प्रधान भी इस काम में जनता की मदद कर सकते हैं.

आज देश के कई किसान खेती में घाटे के कारण आत्महत्या कर रहे हैं. महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों से किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आती रहती हैं. ऐसे में खाद्य भंडारण समय की मांग है. सरकार को इस पर जल्दी से जल्दी ग़ौर करने की ज़रूरत है.