किसी भी लड़की की एक्सेसरीज़ में चूड़ियां सबसे ज़रूरी पार्ट होती हैं. सिर्फ एथनिक ही नहीं, आजकल वेस्टर्न आउटफ़िट्स के साथ भी चूड़ियां कैरी की जाती हैं. मैरिड लड़कियों के लिए इसे सुहाग की निशानी भी माना जाता है. यही वजह है कि बॉलीवुड में भी चूड़ी से रिलेटेड कई सॉन्ग्स बने और पॉप्युलर भी हुए. कांच से लेकर लाख तक, ये चूड़ियां कई तरह के अलग-अलग मेटल और डिज़ाइन की होती है. इंडिया चूड़ियों का बड़ा मार्केट है. यहां चूड़ियां न सिर्फ़ बनती हैं, बल्कि एक्सपोर्ट भी की जाती हैं.

अपने देश में इन जगहों पर बड़ लेवल पर बनाई जाती हैं चूड़ियां

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उत्तर प्रदेश का फ़िरोज़ाबाद कांच की चूड़ियों का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है. मुरादाबाद में भी चूड़ियां बनाई जाती हैं. इसके अलावा हैदराबाद का लाड बाज़ार इंडिया में चूड़ियों का सबसे फे़मस और बड़ा मार्केट है. यहां करीब चूड़ियों की 350 शॉप्स हैं.

लाड बाज़ार, हैदराबाद

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यहां पर सबसे ज़्यादा लाख और कांच की चूड़ियां बनाई जाती हैं. चूड़ियों की कीमत 100 से 5,000 रुपए/पेयर होती है. यहां करीब 150 वर्कशॉप्स हैं, जहां 4,000 कारीगर काम करते हैं. इनमें 60% महिलाएं हैं. महिलाएं यहां ज़्यादातर चूड़ियों पर स्टोनवर्क का काम करती हैं. लाड बाज़ार में पिछले 10 सालों में 200 से15,000 वर्कर्स बढ़े हैं. ये मार्केट इतना Popular है कि प्रोफे़शनल डिग्री वाले भी इस बिज़नेस में शामिल हो रहे हैं. लाख और कांच के अलावा यहां शादी फंक्शन के लिए तांबे और चांदी के फ्रेम की चूड़ियां भी बनाई जाती हैं. चूड़ियां बनाने के लिए अलग-अलग तरह के मटीरियल काम में लिए जाते हैं. लाख की चूड़ियों की कीमत 120 रुपए/पेयर तक होती हैं, वहीं कांच की चूड़ियां काफ़ी सस्ती होती है. इनकी कीमत 20 से 30 रुपए दर्जन तक होती है. चूड़ियों की कीमत इनके डेकोरेशन और मटिरियल पर डिपेंड करती है.

इस चूड़ी इंडस्ट्री का एक काला चेहरा भी है, जो शायद ही आपको पता हो. हैदराबाद, फिरोज़ाबाद जैसे चूड़ी हब में काम करने वाले लोग किन हालातों में काम करते हैं, हमें इसका अंदाज़ा भी नहीं है. हम आपको बताते हैं इसके पीछे का कड़वा सच:

कई बीमारियों का गढ़

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चूड़ी फैक्ट्री में काम करना आसान नहीं होता है, यहां मेटल को गलाना पड़ता है. जिसके लिए आज भी ट्रेडिशनल भट्टियों का इस्तेमाल किया जाता है. इन भट्टियों का तापमान सामान्य से कई गुना अधिक होता है. इनके अलावा केमिकल्स का कॉम्बिनेशन, हीट और जिस तरह का कांच यहां इस्तेमाल किया जाता है, उससे यहां के कारीगरों को चेस्ट और फेफ़ड़ों से जुड़ी कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं. इतना ही नहीं, यहां जलना, एलर्जी और आंखों की रोशनी का कम होना जैसी समस्याएं बेहद आम हैं.

कई घंटों तक काम और तनख्वाह के नाम पर कुछ नहीं

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इन फ़ैक्ट्रियों में कारीगर घंटों तक काम करते हैं, सिर्फ फ़ैक्ट्री ही नहीं, महिलाएं अपने घर पर भी डेकोरेशन का काम करती हैं. अगर तनख्वाह की बात की जाए, तो वो न के बराबर है. इतनी कड़ी मेहनत के बदले इन्हें बहुत कम पैसे दिए जाते हैं. जिससे ये आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं हो पाते.

बाल श्रम की वजह से बच्चे नहीं जा पाते स्कूल

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सालों से इस बिज़नेस से जुड़े लोगों की पीढ़ियां भी इसी काम में लगी हुई हैं. छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, आपको यहां हर उम्र के वर्कर मिल जाएंगे. यहां इतनी छोटी उम्र में बच्चों को काम में लगा दिया जाता है कि वो स्कूल भी नहीं जा पाते. साथ ही फ़ैक्ट्री मालिक भी बच्चों से काम करवाते हैं, क्योंकि उनको बड़ों की बजाए कम पैसे देने पड़ते हैं.

जिन रंग-बिरंगी चूड़ियों की खनक दिल को ख़ुश कर देती है, उन्हीं चूड़ियों से एक आवाज़ इसे बनाने वाले कारीगरों की होती है. और ये आवाज़ ख़ुशी की नहीं होती.

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