'डीडीए की इस नई स्कीम के लिए आवेदन न करें', डीडीए हाउजिंग स्‍कीम-2017 की घोषणा होने के एक दिन बाद ही Youtube पर एक आदमी ने वीडियो अपलोड कर ये सन्देश दिया. उसने कहा, 'हम फंस गए हैं, आप वही गलती न करें.'

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इस वीडियो को अपलोड करने वाले शख़्स का नाम दर्शन वत्स है, जो दिल्ली के रोहिणी इलाके के सेक्टर 34 में रहते हैं. रोहिणी में जहां वो रहते हैं, वो घर डीडीए हाउजिंग स्‍कीम-2014 के अंतर्गत ही उनको आबंटित हुआ था. डीडीए आवास योजना 2014 के तहत लगभग 8500 आबंटियों ने अपने फ्लैट लौटा दिए थे और कहा था कि वो 'रहने योग्य' नहीं थे.

वत्स उन लोगों में से एक हैं, जो वहां रुक गए थे, और अब उनको अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है.

यहां देखिये ये वीडियो:

वो वीडियो में कह रहे हैं, '2014 में हम रोहिणी में रहने के लिए तब आये थे, जब हमको डीडीए आवासीय योजना के अंतर्गत ये फ़्लैट आबंटित हुए थे, लेकिन तब से लेकर आज तक यहां पर सड़कें तक नहीं बनाई गई हैं. आप सड़क, बिजली या पानी के बारे में बात करते हैं, लेकिन यहां कोई सुविधा नहीं है. हम या तो भूमिगत पानी पीते हैं या पानी खरीद कर पीने को मजबूर हैं.' इसके साथ ही वो कहते हैं कि कृपया आप इस योजना के लिए फ़ॉर्म्स न भरें. हम तो इस जाल में फंस गये हैं, लेकिन आप भी वही गलती मत करिये, जिससे बाद में आपको भी पछताना पड़े. वत्स, जो खुद सोसाइटी के Resident Welfare Association के सदस्य हैं, का कहना है कि उन्होंने ये वीडियो इसलिए अपलोड किया है क्योंकि वो डीडीए की नज़रअंदाज़ी से दुखी हैं. डीडीए की तरफ से इस एरिया में बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, पीने का पानी, स्ट्रीट लाइट्स तक मुहैया नहीं करवाई हैं अभी तक. जबकि कई बार इसके लिए शिकायत भी की जा चुकी है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि डीडीए आवास योजना-2017 में अधिकतर फ़्लैट्स वही वाले शामिल किये गए हैं, जिनको 2014 की स्कीम के बाद लोगों को आबंटित किये गए थे, लेकिन लोगों ने वो फ़्लैट्स बुनियादी सुविधायें न मिलने के कारण छोड़ दिए. इस साल डीडीए एक बार फिर रोहिणी सेक्टर 34-35 में 4,349 एलआईजी फ़्लैट्स की पेशकश कर रही है, जिनकी कीमत इस बार की आवास योजना में लगभग 14.8 रुपये से 15.08 लाख रुपये तक राखी गई है.

HT के अनुसार, जब हमने यहां के निवासियों द्वारा कही गई इन बातों की सत्यता की जांच करने के लिए 4 जुलाई को इस एरिया का निरिक्षण किया, तो हमने पाया कि सड़कों को खोदा तो गया था, लेकिन बारिश के कारण ये अब मिट्टी के दलदल में बदल चुकी हैं. महिलायें पीने के पानी को भरने के लिए सरकारी पानी के टैंकर का इंतज़ार करती हैं, क्योंकि इन फ़्लैट्स में अभी तक वाटर पाइपलाइन ही नहीं आई है. इतना ही नहीं इस एरिया तक पहुंचने वाली सड़क भी खस्ताहाल थी.

वहीं सेक्टर 34 में रहने वाले एक और निवासी, उमेश कुमार वाजपेयी ने कहा, अभी तक यहां दिल्ली जल बोर्ड द्वारा पानी की पाइपलाइन नहीं डाली गई है और डीडीए द्वारा ही टैंकरों का पानी उपलब्ध कराया जा रहा है.

साथ ही उन्होंने कहा, 'यह एक बहुत ही निर्बाध क्षेत्र है और स्ट्रीट लाइट्स न होने के कारण या आपराधिक मामले भी आये दिन होते रहते हैं.' वर्तमान में, यहां 7,000 से अधिक फ़्लैट्स में केवल 300 परिवार ही रहते हैं, बाकी सब खाली ही पड़े हैं.

इस बाबत डीडीए चेयरमेन उदय प्रताप सिंह ने कहा, 'इस बाबत डीडीए चेयरमेन उदय प्रताप सिंह ने कहा, 'इस सेक्टर में बुनियादी सुविधाओं का कार्य अब तेजी से होगा और इस साल के अंत तक पूरा हो जाएगा. 'हम लोगों को आश्वासन देते हैं कि हम कार्य पूरा होने के बाद ही चाभियां सौंपेंगे. नवंबर में लॉट्स के बहुत सारे आवेदन आते हैं और इसके बाद काम पूरा करने के लिए कम से कम कुछ महीने ही लगते हैं. हम आपको आश्वासन देते हैं कि पहले से शुरू हो चुके सभी नागरिक काम उससे पहले पूरे हो जाएंगे.' इसके साथ ही उदय प्रताप सिंह ने कहा, 'डीजेबी द्वारा पाइपलाइनों का काम भी समय पर पूरा किया जाएगा.

वत्स ने HT को बताया, ठेकेदारों ने एक वैकल्पिक सड़क बनाने के लिए इस एरिया को खोदा था, क्योंकि उस समय मेन रोड पर निर्माण कार्य चल रहा था. उन्होंने सड़क तो खोद दी लेकिन वो इसको बनाना भूल गए.' 2014 में हुई नीलामी के दौरान 25,000 फ़्लैट्स में से करीब 34 प्रतिशत लोगों ने फ़्लैट्स वापस कर दिए थे, जिसकी वजह उन्होंने वहां के बुनियादी ढांचे में कमी को बताया, जैसे कम जगह, ज़रूरत से ज़्यादा कीमत आदि. इनमें से 22,627 फ़्लैट्स 1 बैडरूम अपार्टमेंट्स थे, जो आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग Economic Weaker Section (EWS) के प्रारूप के अंतर्गत 25-40 Sqm के थे. ये फ़्लैट रोहिणी, नरेला और द्वारका सेक्टर 23 में स्थित थे.'

वहीं एक और निवासी, शिव कुमार झा ने कहा कि यहां फ़्लैट्स लेकर हम तो बहुत पछता रहे हैं. डीडीए ने इलाके में दुकानों, दूध बूथ और आंगनवाड़ी आदि सुविधाओं का वादा किया था, लेकिन पिछले तीन सालों में इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं गया है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर आपको माचिस की एक डिब्बी भी खरीदनी है, तो आपको यहां से करीब 5 किमी दूर जाना पड़ेगा. यहां रहने वालों के पास बाइक या कार होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यहां के नजदीकी बाजार में जाने के लिए ऑटो या ई-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन का कोई साधन नहीं है.

इतना ही नहीं यहां के पार्कों का रख-रखाव भी नहीं किया जाता है, जिस वजह से वहां झाड़ियां और घास बहुत बढ़ गई है.

बारिश के दौरान यहां की स्थिति और भी खराब हो जाती है, क्योंकि जलभराव के कारण आने-जाने के रास्ते भी बंद हो जाते हैं और वहां कीचड़ हो जाती है. यहां के निवासी ये भी शिकायत करते हैं कि सड़क की स्थिति बहुत ख़राब होने के कारण स्कूल भी अपनी बस सेवा देने के लिए अतिरिक्त शुल्क लेते हैं.