Quora एक ऐसी वेबसाइट है, जहां लोग सवाल करते हैं और लोग ही जवाब देते हैं. इस सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर कई बार जवाबों के बीच कुछ ऐसी कहानियां मिल जाती हैं, जिन्हें अगर दुनिया से न बांटा जाये, तो समाज का नुकसान है. यहीं से हमें मिली है एक ऐसी कहानी, जो रिश्तों का सुनहरा रूप दिखाती है. एक बेटी ने अपने पिता की मौत के बाद अपनी मां को नया जीवन दिया और उसके लिए एक साथी भी खोजा.

Quora पर किसी ने सवाल किया कि ऐसा क्या है, जिसकी वजह से आपको ख़ुद पर गर्व है?

जवाब में संहिता अग्रवाल ने लिखा कि अपनी मां की दोबारा शादी कराने के फ़ैसले पर उन्हें गर्व है.

सुनिए उसकी अनोखी कहानी:

मैंने अपने पिता को दो साल पहले खो दिया था. उनकी उम्र उस वक़्त 52 साल थी. उन्हें कोई बीमारी तक नहीं थी, एक हमले में उनकी मृत्यु हो गयी. मेरे घर में में मैं, मेरी बड़ी बहन और मेरी 50 वर्षीय मां अकेले रह गए.
उनके जाने के बाद जो समय हमने बिताया वो कितना भयानक था, ये शायद मैं शब्दों में बयां न कर पाऊं. इस सदमें से बाहर निकल पाना नामुमकिन सा लगने लगा था. मेरी बड़ी बहन शादीशुदा है, उसने खुद को अपने परिवार में व्यस्त कर लिया. लेकिन मेरी मां और मैं रोज़ उन जगहों को देख कर तड़पते थे, जहां पापा खाना खाया करते थे, बैठा करते थे, हंसते थे.
उनके जाने के 6 महीने बाद भी हम इस दुःख में उसी तरह डूबे हुए थे, कोई राहत नहीं थी. मुझे याद है जब मैं दफ़्तर से लौटती थी, तो मां को घर के बाहर सीढ़ियों पर उदास बैठे देखती थी. वो मेरा इंतज़ार करती रहतीं, ताकि कुछ देर को ही सही, उन यादों से ख़ुद को बाहर निकाल पाएं.
मैंने उन्हें पापा की तस्वीर के आगे रो-रो कर भगवान से पूछते देखा है कि उनसे पापा को क्यों छीन लिया. मुझे याद है कैसे वो सोते हुए उनका नाम बड़बड़ाती रहती थीं और अचानक उठ कर पूछने लगती थीं कि पापा कहां है?
अपने माता-पिता को खो देने वाले इस दर्द को महसूस कर सकते हैं.
महीने गुज़रे और मुझे काम के लिए दूसरे शहर रहने जाना पड़ा. ये मेरे लिए बेहद मुश्किल था. मैं मां को छोड़ कर आने के लिए ख़ुद को कोसती थी. बहुत कोशिश के बाद भी मुझे मां के शहर में नौकरी नहीं मिल सकी. मैं हर वीकेंड में उनसे मिलने जाती, ताकि कम से कम दो दिनों के लिए वो ठीक रह सकें.
मां ने मुझसे कहा कि मैं नौकरी न छोड़ूं और वो अपना ख़याल रख लेंगी.
नए शहर में जाने के तीन महीने बाद मैंने अपनी मां के लिए एक साथी खोजने का फ़ैसला किया. मैं किसी ऐसे को ढूंढ़ना चाहती थी जो लगभग उन्हीं की उम्र का हो और उन्हें समझ सके. कोई ऐसा जो अपने साथी को खो चुका हो और एक दोस्त चाहता हो, जिससे मां अपनी ज़िन्दगी बांट सकें और जिसके साथ वो चाय पीते हुए बातें कर सकें.
मैंने उनके लिए एक मैट्रीमोनी वेबसाइट पर अकाउंट बनाया, उनका परिचय और फ़ोटो उसमें दिया और संपर्क करने के लिए अपना नंबर दिया, ताकि संपर्क करने वाला व्यक्ति उनसे पहले मुझसे होकर गुज़रे. मैंने कई लोगों से बात की, जिसके बाद मुझे ये व्यक्ति मिले, जो मेरी मां की ही तरह सरकारी नौकरी कर रहे थे, लगभग उन्हीं की उम्र के थे. वो मुझे समझदार लगे, मैंने उनके लिए अपनी मां से बात की.
मां को शादी के लिए मनाना आसान नहीं था. उन्होंने एक भारतीय विधवा की तरह रियेक्ट किया. उन्होंने कहा "दुनिया के ताने सुनने से अच्छा है मैं ज़िन्दगी अकेले बिता दूं. समाज और मेरे अपने रिश्तेदार भी ऐसा करने के बाद मुझे जज करने लगेंगे.
मैंने उन्हें मनाने के लिए बहुत कुछ कहा लेकिन शायद जो बात उन्हें समझ आयी, वो ये थी:
दुनिया में हर इंसान को अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने का अधिकार है. हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि समाज क्या सोचेगा, क्योंकि जब आप 80 की उम्र में अकेले होंगे, तब समाज आपके पास नहीं आएगा. आपके ज़्यादातर रिश्तेदार आपके कॉल इग्नोर करने लगेंगे, जब आप बीमार और ज़रूरत में होंगे, तब इनमें से कोई नहीं आएगा. ये आपके लिए बस एक साथी कर सकता है. आप भी उसके लिए ये करोगे, क्योंकि बच्चे आपके कितने भी अच्छे क्यों न हों, एक समय के बाद आपको एक जीवनसाथी की ज़रूरत पड़ती ही है, जिसके साथ आप अपनी ज़िन्दगी बांट सकें. आप ये डिज़र्व करती हो. पापा के चले जाने में आपकी कोई ग़लती नहीं थी, लेकिन अगर आप अब अपनी ज़िन्दगी को दूसरा मौका नहीं देतीं, तो ये आपकी ग़लती होगी.
कुछ दिनों पहले उनकी शादी हो गयी. उनके परिवार ने मेरी मां को खुली बांहों से अपनाया. मैं बता नहीं सकती उनके चेहरे पर दोबारा वो मुस्कान देख कर मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी. उन रंगीन कपड़ों और गहनों में वो फिर से ख़ूबसूरत लगने लगी थीं. पहले वो मुझे फ़ोन करके कहती थीं कि मैं उनकी चिंता न करूं और वो अपना ख़याल रख रही हैं. पर अब वो फ़ोन पर कहती हैं कि अब उनके पास कोई है, जो उनका ख़याल रखता है. उनके साथ वो बेहद सहज और ख़ुश रहती हैं.
हां, मुझे अपने इस फ़ैसले पर गर्व है.

ये कहानी साझा करने के पीछे मेरा उद्देश्य था कि अपने माता-पिता से दूर रह रहे लोग सोच सकें कि कहीं उनके माता-पिता बहुत अकेले तो नहीं हैं. वो खुद नहीं बताएंगे कि वो दुखी हैं या बीमार हैं, क्योंकि वो कभी भी अपने बच्चों को दुखी नहीं करना चाहते. लेकिन ये आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप भी इसका ख़्याल रखें कि वो खुश हैं या नहीं.

ये कहानी बहुत प्यारी, लेकिन ये सोचने पर भी मजबूर करती है कि क्यों हमारे समाज में ऐसा कुछ होना इतना आम नहीं है. क्यों हम खुद पर 'समाज क्या सोचेगा' का बोझ लादे घूमते रहते हैं. किस्मत में क्या लिखा है, किसी का दुनिया से चला जाना, ये सब हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन ज़िन्दगी को एक मौका देना हमारे हाथ में ज़रूर होता है.

Source: Quora