डॉक्टर जितेन्द्र चतुर्वेदी का बचपन बेहद कठिनाइयों में बीता. 1973 में उनके पिता के गुमशुदा होने के बाद उन्हें गरीबी में जीवन बिताना पड़ा था. इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि वो अपनी ज़िन्दगी अन्य बच्चों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने में लगायेंगे.

उनकी मां अनपढ़ थीं, इस कारण उनके पिता के जाने के बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उस वक़्त ही उन्हें शिक्षा का महत्व समझ आ गया था. इस संघर्ष में उन्होंने अपना बचपन कहीं खो दिया.

उन्होंने 1990 में BHMS (Bachelor of Homeopathic Medicine and Surgery) की डिग्री ली थी. इसके बाद पैसे कमाने के बजाय वो उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े गांव में चले गए. बहराइच के बिठिया में वो एक झोपड़ी में रहने लगे. वहां उन्होंने देखा कि कई किसान 'बेगार' के रूप में काम कर रहे थे. इस तरह काम करने को बंधुआ मज़दूरी कहते हैं, जिसके लिए कोई पैसे नहीं दिए जाते.

भारत में इसे 1950 में ही बैन कर दिया गया था, लेकिन गांव के लोग अब भी इसमें फंसे हुए थे. ये वो लोग थे, जो जंगल में रह रहे थे और अधिकारी इनसे जबरन काम करवा रहे थे. वन विभाग के अधिकारी उनके अनपढ़ होने का फ़ायदा उठा रहे थे.

उन्होंने नुक्कड़ नाटक के ज़रिये इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना शुरू किया. जब लोगों ने उनका समर्थन करना शुरू किया, तो उन्होंने एक स्कूल खोला. इससे चिढ़ कर कुछ लोगों ने उन्हें एक झूठे केस में फंसाने की कोशिश की. उन्हें हथकड़ी लगायी गयी और गांव वालों के सामने घुमा कर बदनाम करने की कोशिश की गयी.

इसके बाद जितेन्द्र ने अपनी संस्था खोलने का निश्चय किया. 1993 में उन्होंने गांव छोड़ दिया और NGO खोलने के लिए रिसर्च करने लगे. 2002 में वो बहराइच लौटे और 'देहात' नाम की संस्था की शुरुआत की.

सरकारी अधिकारी कभी इन गांव वालों की मदद नहीं करते थे, क्योंकि उनके पास नागरिक अधिकार नहीं थे, उनके पास निवासी प्रमाण पत्र नहीं था, इसलिए उनके बच्चे पढ़ नहीं पाते थे, कोई भी बैंक उनका खाता खोलने के लिए तैयार नहीं थी. इन गांवों में कोई स्कूल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, यहां तक ​​कि पंचायत भी नहीं थी. ये लोग लगभग सरकार के लिए गैर-मौजूद थे.

2003 में उन्होंने 'वन अधिकार आंदोलन' शुरू किया और गांव के लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और उनके पहचान पत्र बनवाए. वो इसके साथ उनके लिए रोज़गार पैदा करने के प्रयास भी कर रहे थे.

उन्होंने ग्रामीणों को तकनीक और जैविक तरीकों से खेती करने में मदद की, जिससे किसान हर साल प्रत्येक एकड़ से 1 लाख तक की कमाई करने लगे. 2006 में वन अधिकार अधिनियम पारित किया गया, जिसमें वन-आश्रित आदिवासी समुदायों के अधिकारों को संबोधित किया गया.

वो अब भी हज़ारों किसानों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. उनके प्रयासों से इन गांवों में बिजली, सड़कें, हैण्ड-पम्प आ गए हैं. देहात संस्था अब दस स्कूल चलती है, जिनमें 400 लड़कियां पढ़ती हैं.

इस संस्था ने मानव तस्करी के ख़िलाफ़ भी काम शुरू किया है. उनके प्रयासों से 5000 युवाओं, 2000 बच्चों और 6000 किसानों की ज़िन्दगी बदल गयी है.

Source: Thebetterindia