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देव-दासी यानि ‘देव की दासी’, वो जिसे देव की सेवा करने के लिए ख़ास तौर पर चुना गया हो. हिन्दू परंपरा का अखंड स्तंभ है देव पूजा और इसी का एक अभिन्न अंग हैं देव-दासियां. भारत में बहुत पुराने समय से चली आ रही है ये परंपरा और आज भी दक्षिण भारत में कई देव-दासियां हैं. लेकिन इस समय उनका वो वर्चस्व नहीं रहा जो कभी हुआ करता था.

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प्रभु-वंदना में अपना जीवन समर्पित करने वाली देवदासियों को गृहस्त जीवन से स्वतंत्रता मिली थी ताकि वो भाव-भक्ति में लीं हो सकें. धीरे-धीरे देव दासियां राज महल की शान बनने लगी. नृत्य-कला और भाषा-विज्ञान में देव-दासियों को वो मुक़ाम हासिल था जो उस वक़्त के लिहाज़ से बहुत बड़ा था. राजा-महाराजा हर शुभ काम की शुरुआत देव-दासियों के हाथों से करवाते थे. ये ही एक वज़ह थी कि देव-दासियां धनी हुआ करती थी. लेकिन धीरे-धीरे उनका काम सिर्फ़ बड़े-बड़े लोगों की शारीरिक ज़रूरत पूरी करना रह गया. ऐसा क्यों हुआ, इसके पीछे बहुत सारे कारण हैं.

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एक समय ऐसा आया कि राजा-महाराजाओं ने अपनी विलासिता के दायरे इतने बढ़ा लिए, कि उसमें देव-दासियां भी आ गयीं. क्योंकि बाहर से किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं था, इसलिए देव-दासियों को प्रभु की सेवा छोड़ 'नए प्रभुओं' की सेवा करनी पड़ी और ये प्रचलन बन गया. जब इस देश में ब्रिटिश आए, तो उन्होंने देव-दसियों का भोग करना शुरू कर दिया. देखते ही देखते प्रभु वंदना करने वाली देव-दासियां वेश्यावृत्ति की दलदल में आ फंसी.

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ये ज़्यादा लोगों को नहीं पता होगा, कि देव-दासियों का कोई पति नहीं होता. क्योंकि उनकी शादी पूरे रीति-रिवाज़ से 'देव' से हो जाती है. इसलिए वो कभी शादी नहीं करतीं. लेकिन अब उनके लिए आने वाले 'कस्टमर्स' देव हो गए हैं.

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इनसे जन्मा कोई बच्चा देव-दासी की ज़िम्मेदारी होती है. अगर कोई लड़की हुई तो भी देव-दासी बन जाती है. सोचिए आज के समय में एक लड़की, जिसके मन में न जाने कितनी उमंगें होंगी, कुछ बड़ा करने का ख़्वाब होगा, वो अगर 'देव-दासी' बना दी जाए, तो उस पर क्या बीतेगी?

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एक पल के लिए सोचा जाए उस लड़की के बारे में, जो न जाने कितने लोगों को 'खुश' करती है? जो भी लोग उसके पास आते हैं, वो सिर्फ़ अपने जिस्म की भूक मिटाने. और वो बेचारी उनको अपना 'देव' मानकर उनकी हो जाती है, लेकिन कोई उसका नहीं होता. ऐसा कोई कानून, कोई सिस्टम नहीं है जो उनके बारे में सोचे, पर हमें इस बारे में सोचना होगा और कुछ करना भी होगा.

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