साल 1949 में 14 सितम्बर को हिंदुस्तान के संविधान में हिंदी को देश की अधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया गया था. हिंदी ने एक ऐसा दौर भी देखा है, देश में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था. उस दौरान हिंदी लिखने, बोलने और हिंदी साहित्यकारों को तुच्छ समझा जाता था. देश की राष्ट्र भाषा होते हुए भी हिंदी और हिंदी बोलने वालों के साथ परायों सा व्यवहार किया जाता था. मगर हमारे देश में कई ऐसे महान लेखक और विवेकानन्द जैसे वक़्ता हुए हैं, जिन्होंने हिंदी को विश्व पटल पर ख़्याति दिलाई. ऐसे ही एक महान लेखक थे धर्मवीर भारती, जिन्होंने हिंदी को अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. उन्होंने हिंदी में न केवल कालजयी रचनाएं लिखीं, बल्कि हिंदी को अलग पहचान भी दिलाई.

वैसे तो 200 साल की ग़ुलामी के बाद देश आज़ाद हो गया था, लेकिन आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद एक दौर ऐसा था, जब हिंदी क्षेत्र से आने वालों को 'काऊ बेल्ट' कहकर बुलाया जाता था. और हिंदी को समर्पित भारती जी को ये मंज़ूर नहीं था और उन्होंने इसका पुरज़ोर विरोध भी किया. वो धर्मवीर भारती जी ही थे, जिन्होंने अपने लेखन में उन लोगों को 'कांव-कांव बेल्ट' की संज्ञा दी, जो हिंदी क्षेत्र से आने वालों को 'काऊ बेल्ट' से सम्बोधित करते थे.

आज हम आपके लिए उनके एक ऐसे ही लेख के कुछ अंश लेकर आये हैं. ये पूरा लेख आपको 'काऊ बेल्ट की उपकथा' में मिल जाएगा.

हिंदी-भाषी प्रदेश, यानी राजनीतिक भाषा में हिंदी पट्टी, यानी स्नाब अंग्रेजीपरस्त अफसरों और पत्रकारों की भाषा में 'काऊ वेल्ट', यानी अशिक्षा, निर्धनता, पिछड़ेपन, जातिवादी और संप्रदायवादी कट्टरता में निमग्न अंधकार-भरी पट्टी - देश की प्रगति और आधुनिकीकरण में सबसे बड़ा अवरोध; उपहास, उपेक्षा और अवमानना का पात्र. पर अजीब बात यह है कि इन तमाम लांछनों के बावजूद यही पट्टी है जहाँ से एक के बाद एक प्रधानमंत्री निकलते चले जाते हैं, बड़े प्रशासक, योजना-विधायक, पक्ष और विपक्ष के बड़े-बड़े राजनेता, बड़े पत्रकार, बड़े शिक्षाशास्त्री, बड़े उद्योगपति और बड़े अभिनेता. मानो यह अंधियारी पट्टी रत्नों की खान है. विचित्र विडंबना यह है कि जो इस पट्टी को आलस्य, जड़ता, पिछड़ेपन और सांप्रदायिक कट्टरता का प्रतीक मानते हुए इसकी हँसी उड़ाते हैं वे या तो इसी पट्टी से निकल कर आए हैं या अपने अस्तित्व के लिए इसी पट्टी के समर्थन पर पूरी तरह निर्भर होते हैं.

क्या सचमुच हिंदीभाषी लोगों की मानसिकता में बुनियादी तौर पर कुछ ऐसा है जो उन्हें जाति और धर्म के स्तर पर कट्टर, असहिष्णु और पिछड़ा हुआ बनाता है, क्या वे मूलतः अकर्मण्य और आलसी हैं! आखिर उनका असली चेहरा क्या है? बाकी आरोपों पर फिर कभी बात करेंगे, आइए इस बार उनकी असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरपन की जाँच करें, जरा बारीकी से गहरे उतर कर.

'जिस चीज को हम बहुत नजदीक से देखते रहे हैं, अक्सर उसके बारे में हमारा परिप्रेक्ष्य बहुत सीमित हो जाता है. फिर जरूरत होती है काफी दूर से जाकर उसे देखने की ताकि उसे, उसके समूचे परिवेश को विस्तृत संदर्भों में पहचाना जा सके. तभी न मौसम की सही जानकारी के लिए धरती से सैकड़ों मील ऊपर उड़ते हुए उपग्रह के कैमरे से देखना पड़ता है. इसलिए आइए आपको हिंदी प्रदेश से हजारों मील दूर ले चलते हैं.

हिंदी प्रदेश से हजारों मील दूर, थाइलैंड की राजधानी बैंकाक. इतने दिनों से देश के बाहर चक्कर काट रहा हूं कि देश की ऋतुओं और तिथियों का कोई अंदाज ही नहीं रहा. हवाई अड्डे से होटल बहुत दूर है और होटल पहुंचने के पहले ही बीच में रुक कर एक मेले में जाना है. मेला काहे का? कुश्ती का. मैं हक्का-बक्का हूं कि यह कैसा होगा और कुश्ती से मेरा क्या ताल्लुक? तीन ओर मकानों से घिरे एक खुशनुमा मैदान में हजारों भारतीयों की भीड़. बीच-बीच में छह-सात अखाड़े खुदे हुए हैं. पहलवान अपनी मंडलियों के साथ 'बजरंगबली की जय' बोलते चले जा रहे हैं. मेजबान मुझको आश्चर्य-चकित देख कर मुस्कुराते हैं और फिर आहिस्ते से समझाते हैं - 'आप बंबई में रहते हैं न, भूल गए होंगे कि आज नाग पंचमी है. हम लोग सौ साल से यहां हैं, पर अपने त्योहार नहीं भूले. नाग पंचमी को हम लोगों ने युवा-दिवस बना लिया है. उसी तरह अखाड़े खुदते हैं जैसे यू.पी., बिहार में. आज की कुश्ती के चैंपियन को पुरस्कार आपके हाथ से दिलाएंगे. 'नाग पंचमी की पुरस्कार विजेता थी लछमन अखाड़े की युवा जोड़ी इसाक गफूर और राघव मिसरा.

ये थे 'काऊ बेल्ट' से जा कर बैंकाक में बसे हुए प्रवासी भारतीय. इनमें साधारण दरबान और चौकीदारों से ले कर लखपति, करोड़पति लोग थे. मालूम हुआ कि बैंकाक का सारा लकड़ी का व्यापार, इमारती सामान की तिजारत, मकान बनाने का उद्योग, मशीनों और फैक्टरियों को संचालित करने का उद्यम, कपड़े की आढ़तें - सब भारतीयों के हाथ में हैं और इन सभी भारतीयों में नब्बे प्रतिशत यू.पी., बिहार के लोग हैं, पिछड़ी हुई हिंदी पट्टी के. अशिक्षाग्रस्त काऊ बेल्ट के.

शाम को डिनर रखा गया था अब्दुल रज्जाक साहब के घर पर. वे बैंकाक में इमारती लकड़ी के सबसे बड़े व्यापारी हैं थाईलैंड के मिनिस्टरों और सेना-पतियों के हमप्याला, हमनेवाला. हज कमेटी के सर्वेसर्वा, मलेशिया और थाईलैंड के इस्लामिक कल्चर फेडरेशन के चैयरमैन - पर आज भी दिल उनका यू.पी. में रमा हुआ है. यू.पी. से कोई मेहमान आए, पहली शाम का डिनर उन्हीं के यहां होना जरूरी है. पता नहीं कैसे उन्हें मालूम हो गया था कि मैं आया बंबई से हूं, पर हूं मूलतः यू.पी. का.

रज्जाक साहब तपाक से गले मिले. बैंकाक के भारतीयों की समस्याएँ बतलाते रहे. भारत का हालचाल पूछते रहे. फिर बोले खाना मेज पर लगा है. पर दो मिनट ठहर जाइए. मेरा एक दोस्त आपसे मिलने आया है खास तौर से. हाथ मुंह धोने गया है. कौन है यह दोस्त?

दो-तीन मिनट बाद बाथरूम का दरवाजा खुला और उसमें से जो लंबे से अधेड़ साहब निकले उनका हुलिया साक्षात 'काऊ बेल्टी' था. धोती का फेंटा कसते हुए, भीगे जनेऊ से पानी सूंघते हुए, लंबी चोटी को फटकार कर गांठ बांधते हुए उन्होंने नम्रता से नमस्कार किया. मालूम हुआ, ये हैं रामभरोसे पंडित. बैंकाक के हिंदू सेवा-दल के अध्यक्ष. भारत प्रवासी ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टी, विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय महामंत्री. शिखा बांध कर, बदन पर एक फतूही डाल कर जब वे खाने की मेज पर बैठे तो पता चला कि रज्जाक और रामभरोसे की जिगरी दोस्ती पूरे देश में मशहूर है. आंधी हो, पानी हो, हफ्ते में कम-से-कम दो दिन दोनों साथ डिनर लेते हैं, कभी रज्जाक साहब के यहां, कभी रामभरोसे पंडित के यहां.

रज्जाक साहब प्रेम से रामभरोसे को टांग खिचाई कर रहे थे - 'साहब यह हिंदू सभा का नेता है पर महीनों तक जनेऊ नहीं बदलता. बार-बार मुझे याद दिलानी पड़ती है. परले सिरे का कंजूस है.' रामभरोसे कहाँ पीछे रहनेवाले, बोले - 'साहब, इसकी बातों में न आइएगा. इसका कोई दीन ईमान है! मस्जिद के मकतबे में जंगली लकड़ी की शहतीर लगवा रहा था. मैं आ कर बिगड़ा तो इसने साखू की लकड़ी लगवाई. अरे धरम के काम से तो मुनाफा न कमा.'

बहरहाल खाना शुरू होता है तो यह भेद खुलता है कि हफ्ते में दोनों दो बार साथ खाना खाते हैं, वह इसलिए कि अपनी-अपनी संस्थाओं की समस्याओं के बारे में एक दूसरे की सलाह जरूरी होती है. रज्जाक साहब हिसाब-किताब कानून-आईन में पक्के हैं और रामभरोसे पंडित को संस्था संचालन... लोकप्रियता के हथकंडे और तिकड़में खूब आती हैं. रामभरोसे के हिंदू सेवा दल वगैरह का हिसाब-किताब रज्जाक साहब के जांचे बिना पूरा नहीं होता और रज्जाक साहब की संस्थाओं में कोई झगड़ा-झंझट उठ खड़ा होता है तो रामभरोसे की सूझबूझ काम में आती है. पिछ्ले साल हज जानेवाले यात्रियों से मलायी और चीनी कुलियों से कुछ झंझट हो गया और मामला जरा तूल पकड़ने लगा. रज्जाक साहब ने संदेशा भेजा. रामभरोसे दौड़े हुए आए और डाँट-फटकार मानमुहार कर आधे घंटे में मामला रफा-दफा कर दिया. एक बार बैंकाक के कलेक्टर ने जमीन का कोई पुराना कानून लागू कर नाग पंचमी के मेले पर बंदिश लगा दी और पिछले दस साल का हर्जाना लाखों में माँग लिया. रज्जाक साहब पहुँच गए दो वकील ले कर. कानून पर बहस की, हर्जाने की रकम कम कराई और नाग पंचमी के मेले की लिखित अनुमति लेकर डेढ़ घंटे में पहुँच गए. अखाड़े चालू करवा दिए.

ये किस्से सुन कर जब जब मैंने रज्जाक साहब से कहा कि 'खूब है आप लोगों की दोस्ती!' तो रामभरोसे बोले - 'काहे को दोस्ती डाक्टर भारती साहेब, असल में हम आजमगढ़ के हैं, इहौ सारू आजमगढ़ का है. एक माई का दुई बेटवा समझौ. ई बात जुदा है कि हम लायक बेटवा हैं, ई जरा नालायक निकल गवा. मुला धन दौलत एही कमाता है. बात ई है कि लक्षमी मैया तो उल्लुऐ पर बैठती है न...' और रज्जाक साहब का एक घूसा रामभरोसे की पीठ पर पड़ा - 'अबे देवी देवताओं की तो इज्जत रख हंसी मजाक में उन्हें भी घसीटता है. जाने इसे हिंदू सभा को सेक्रेटरी किसने बना दिया?

अपने-अपने धर्म पर अखंड आस्था. दूसरे धर्म के प्रति गहरा निश्छल आदर और जात-पात सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर पूरी भारतीय जाति को अपना समझनेवाले ये रज्जाक और रामभरोसे के चेहरे मेरे जहन में गहरे दर्ज हैं, क्योंकि हिंदी पट्टी का, हम हिंदीभाषियों का यही असली चेहरा है...

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यहां इस लेख को रखने का केवल एक उद्देश्य है कि आज भी ऑफ़िस में, स्कूल, कॉलेजों में, किसी भी कंपनी में काम करने के लिए हिंदी के अलावा आपको अंग्रेज़ी में पारंगत होना आवश्यक है. हिंदी हमारी अपनी भाषा है और इसको बोलने में शर्म क्यों?