आज़ादी की लड़ाई अपने मुकाम पर थी. गली-मोहल्लों में कहीं गांधी जी ज़िंदाबाद, तो कहीं जिन्ना ज़िंदाबाद के नारे लग रहे थे. हर तरफ़ जुलूस और जलसे निकाले जा रहे थे. इन सब बातों से मुख़र एक लम्बे कद-काठी का शख़्स लाहौर में अख़बार के दफ़्तर की टेबल पर बैठा फ़िल्मी दुनिया में हलचल मचाने की तैयारी कर रहा था.

देश आज़ाद हुआ, तो बंटवारे की आग में अपना घर-बार छोड़ कर मुंबई आ बसा और एक नई फ़िल्मी कहानी को ढूंढने में लग गया, जिसके बाद उसकी मुलाक़ात इंदर सेन जोहर से हुई. इनके साथ मिल कर इस शख़्स ने 1951 में बॉलीवुड को अपनी पहली फ़िल्म 'अफ़साना' दी. फ़िल्म हिट रही और पर्दे पर अपनी सिल्वर जुबली मनाने में कामयाब रही, पर ये तो बस शुरुआत भर थी.

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ये शख़्स कोई और नहीं, बल्कि मशहूर डायरेक्टर, प्रोडूसर और राइटर बी.आर. चोपड़ा था. वहीं बी.आर. चोपड़ा जिन्होंने 'नया दौर', 'धुंद' और 'कल की आवाज़' जैसी फ़िल्में बना कर कभी लोगों को सपने दिखाए, तो कभी उनके अंदर उमड़ रही आग को आवाज़ दी.

बी.आर. चोपड़ा ने अपने फ़िल्मी करियर के दौरान कई फ़िल्में बनाई, पर उन्हें असल पहचान टेलीविज़न धारावाहिक महाभारत से मिली. ये वही महाभारत थी, जिसने बी.आर. चोपड़ा को आम आदमी का डायरेक्टर बना दिया था. आज की तरह ही उस समय भी निर्माता-निर्देशक किसी धार्मिक महाकाव्य को छूने से बचा करते थे, पर बी.आर. चोपड़ा ने न सिर्फ़ महाभारत को छुआ, बल्कि उसे ऐतिहासिक भी बना दिया.

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इस महाकाव्य को मौजूदा संदर्भ से जोड़ने के लिए बी.आर. चोपड़ा ने संवाद लेखन का कार्य उस समय के मशहूर लेखक राही मासूम रज़ा के हाथों में सौंपा, जिनकी कलम से कालचक्र ने महाभारत में वाचक का काम किया. एक हिन्दू महाग्रंथ के संवाद किसी मुस्लिम लेखक से लिखवाना अपने-आप में विवादों को निमंत्रण देने के जैसा था, पर बी.आर. चोपड़ा अपने इस सपने के साथ पूरा-पूरा इंसाफ़ चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने इस चुनौती को भी स्वीकार किया.

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आख़िरकार महाभारत का पहला एपिसोड टेलीविज़न पर आया. लोगों ने पहले एपिसोड के साथ ही महाभारत को अपना भरपूर प्यार दिया. इस प्यार का आलम ये हो गया कि लोग महाभारत के किरदारों को असल मानने लगे. धारावाहिक में कृष्ण की भूमिका निभाने वाले नितीश भारद्वाज को लोग असल में भगवान कृष्ण की संज्ञा देने लगे, वो जहां जाते लोग उनके पैर छूने के लिए करीब आ जाते.

आज बेशक बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित महाभारत को बने 2 दशक से ऊपर का समय हो गया हो. तकनीक का विकास होने के बाद कई और लोगों ने महाभारत की कहानी को नए सिरे से कहने की कोशिश की हो, पर आज भी महाभारत के नाम पर बी.आर. चोपड़ा ही याद आते हैं.

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