एक मां अपने बेटे की हालत देख कर इतना मजबूर है कि वो उसकी जान बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाना चाहती है. ये दर्दनाक कहानी है 22 वर्षीय पकंज राणा की, जिसके पैर बचपन से ही बेड़ियों से बंधे हुए हैं. पकंज की मां को हर पल यही डर सताता रहता है कि अगर उनका बेटा इन ज़ंजीरों से बाहर निकला, तो जंगली जानवर उसे अपना शिकार बना लेंगे. दरअसल, पंकज नामक ये शख़्स क्वॉड्रिपरीसिस नामक बीमारी से पीड़ित है, जिसके कारण उसके हाथ-पैर काम नहीं करते. इसके साथ ही उसे अफ़ेज़िया भी है, जिसकी वजह से वो ठीक से बोल भी नहीं सकता.

पकंज के पिता दिल्ली में एक कुक के रूप में काम करते थे, लेकिन आठ साल पहले उनका निधन हो गया. पति की मौत के बाद से सरोज राणा मज़दूरी कर किसी परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं. रुद्रप्रयाग के सौंदा गांव में रहने वाली सरोज राणा का कहना है कि इस वक़्त उनकी आर्थिक हालत इतनी खस्ता है कि वो चाह कर भी अपने बेटे का इलाज नहीं करा सकती.

अपनी दुखद दांस्ता बताते हुए सरोज कहती हैं 'अपने पति के साथ मैं पंकज को कई मंदिरों और हेल्थ सेंटर भी ले गई, लेकिन कोई भी ये नहीं बता पाया कि आख़िर पंकज को हुआ क्या है. इतना ही नहीं, उन्हें पिछले 6 महीने से पेंशन के 8 हज़ार रुपये भी नहीं मिले. सरोज का परिवार उनकी मज़दूरी और पंकज को मिलने वाली 1000 रुपये की दिव्यांग पेंशन से चलता है.'

सरोज कहती हैं कि वो पंकज और उसके जैसे कई बच्चों की हालत प्रधानमंत्री को बताना चाहती हैं. आगे बताते हुए वो कहती हैं कि कुछ दिन पहले ही पीएम केदारनाथ गए थे और उन्होंने फिर आने के लिए कहा है. सरोज चाहती हैं कि पीएम देखें कि देवभूमि में बच्चे स्वास्थ्य व्यवस्था के अभाव में कैसे रहते हैं. कम से कम पहाड़ों में स्वास्थ्य लाभ कैंप बनाए जाएं, जिससे कि लोगों को मैदानों में न जाना पड़े. यहां तक कि कई लोग तो उतना खर्च उठा नहीं पाते.

विशेषणज्ञों की मानें तो पंकज उन बच्चों में से हैं, जिनका जन्म घर पर ही पारंपरिक तौर-तरीकों से हुआ था. ऐसे में कई बच्चों को ऐसी तकलीफ़ें हों जाती हैं. रुद्रप्रयाग ज़िले की CMO सरोज नैथानी सरोज राणा के परिवार को हर महीने 2000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं.

सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक, उत्तराखंड में लगभग 37 प्रतिशत बच्चे घरों में जन्म लेते हैं, न कि अस्पतालों में, जिस कारण उन्हें ऐसी समस्याएं होती हैं. ऐसी परेशानियों के साथ जन्मे बच्चों के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया है, लेकिन गरीबी और ट्रैवल की दिक्कतों के कारण बच्चों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल नहीं पातीं.