जब हौसला बना लिया ऊंची उड़ान का, तो फिर देखना फ़िज़ूल है कद आसमान का.

मुंबई की रहने वाली परविंदर चावला इसका जीता-जागता उदाहरण हैं, जिन्होंने व्हीलचेयर के सहारे अकेले 23 देश और 6 महाद्वीपों की यात्रा कर डाली. हांलाकि, आप में से कुछ लोगों को लग सकता है कि इसमें ऐसा क्या ख़ास है, लेकिन परविंदर के लिए ये सब उतना आसान नहीं था जितना सुनने में लग रहा है. वैसे परविंदर को प्यार से लोग पम्मू कह कर भी बुलाते हैं.

लुधियाना में जन्मी और होममेकर पम्मू कक्षा 6 में पढ़ती होंगी, जब वो मुंबई शिफ़्ट हो गई थी. पिता की मृत्यु हो चुकी थी. उनके पिता वाशी और बांद्रा में रेस्टोरेंट चलाते थे. फिलहाल उसकी देख-रेख का ज़िम्मा परिवार के हाथ में है. परविंदर महज़ 15 साल की होंगी, जब उन्हें गठिया ने जकड़ लिया था. हालात मुश्किल थे, लेकिन वो डरी नहीं, रुकी नहीं और समाज की रुढ़िवादी सोच को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ती गई.

चार भाई-बहनों में परविंदर को घर पर सबसे ज़्यादा प्यार-दुलार मिलता था, उनकी मां अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाती थी, लेकिन यहां समस्या ये थी कि खाने के लिए उनका पूरा मुंह नहीं खुल पाता था. इसी परेशानी को देखते हुए, उनकी मां एक वृद्ध आयुर्वेद के पास ले गई, जिसके मुताबिक बड़े होने पर परविंदर की स्थिति अधिक ख़राब हो जाएगी. ख़ैर, पम्मू ने उसकी बात पर ध्यान न देते हुए, एक साल बाद दवाई लेने से इंकार कर दिया.

वहीं कक्षा 12 में वो कलाई और घुटने में दर्द के कराण परेशान रहने लगी. परीक्षा के दौरान जब उनसे शरीर का दर्द बर्दाशत नहीं हुआ, तो वो Acupuncturist के पास गई, जिसने सिर्फ़ इंजेक्शन लगा कर घर भेज दिया. एक तरफ़ पम्मू की बीमारी और दूसरी तरफ़ पंजाब स्थित उनके पृतक घर में बहन की शादी, दोनों ही चीज़ों में वो ख़ुद को बेसहारा महसूस कर रही थी. परिवार के सभी सदस्य डांस कर रहे थे, लेकिव वो अपने पंसदीदा गाने 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैं' पर डांस नहीं कर पाई.

वो करीब दो साल तक बेड पर रहीं. खाने-पीने से लेकर वॉशरूम जाने तक अपनी मां पर निर्भर थी. बिस्तर पर लेटे हुए वो पंखे को ताका करती थी. अगर कोई बच्चा उनके आस-पास से भी गुज़र जाए, तो वो डर कर चिखने लगती थी कि कहीं बच्चों के छूने से उनका दर्द और न बढ़ जाए. बस यही पल था जब पम्मू को लगा ज़िंदगी गुलाब के फूल जितनी ख़ूबसूरत नहीं है. उन्होंने हालातों को स्वीकारा और किसी पर बोझ न बनते हुए कॉलसेंटर से लेकर बेबीसिटिंग तक की जॉब की, यहां तक कैटरिंग सर्विस भी चलाई.

परविंदर ने पहली बार दोस्तों के साथ जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग की यात्रा की. गुलमर्ग की ख़ूबसूरती देखने के बाद उन्हें लगा कि ये स्वर्ग है और उन्हें दुनिया घूमनी चाहिए. वापस लौटने के बाद उन्होंने कई ट्रैवल कंपनियों से बात कर दुनिया की सैर का प्लान बनाया, पर उन्होंने ये कह कर मना कर दिया कि वो सिर्फ़ अपने दोस्तों के साथ ही जा सकती हैं. पर पम्मू ने हार नहीं मानी और दोस्त के साथ मलेशिया विज़िट के दौरान, दो दिन की छुट्टी लेकर सोलो ट्रिप पर निकल गई. कम बजट वाली फ़्लाइट, नो रूम सर्विस वाला होटल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में घूम कर उन्हें महसूस हुआ कि वो अकेले यात्रा कर सकती हैं.

इसके अलावा उन्होंने चीन की यात्रा के दौरान ताइवान में पैरालाइडिंग की, Ecuador में Zip-Lining और वो हाल ही में यूरोप भी घूम चुकी हैं. परविंदर ने ‘wheelchairandeye.com‘ नामक वेबसाइट भी शुरू की है, जिससे दूसरों को यात्रा करने में मदद मिले.

अब बोलो अगर एक महिला व्हीलचेयर पर होने के बावजूद दुनिया घूम सकती है, तो उसके लिए कुछ नामुमकिन हो सकता है क्या?

Source : TBI