पुरानी दिल्ली का चावड़ी बाज़ार न सिर्फ़ तांबे, पीतल, डिज़ाइनर शादी कार्ड और हार्डवेयर के सामानों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है, बल्कि किसी समय शाहजहानाबाद के अभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए सैर करने का एक प्रमुख ठिकाना भी था. एक समय में चावड़ी बाज़ार वैश्याओं का ठिकाना हुआ करता था. ऐसा कहा जाता है कि इस गली की हर सीढ़ी वैश्यालय की ओर जाती थी.

चावड़ी बाज़ार के वेश्यालय के इतिहास को जानने का सबसे बेहतर माध्यम है- ‘Tawaifs of Chawri Bazaar, From Bordello to Brothel,’. यह एक स्थानीय संगठन GointheCity द्वारा आयोजित एक ऐसा कार्यक्रम है, जो आपको उस दौर के चावड़ी बाज़ार और वेश्यालय का अनुभव कराएगा. लेकिन ध्यान रहे, आप इस उम्मीद में मत जाइये कि आपको वहां कोई वेश्या दिखेगी. इस इलाके की संरचना इस कदर है कि अगर किसी कपल को इस इलाके में छोड़ दिया जाए, तो उसे ढूंढना मुश्किल हो जाएगा. खैर, यह इवेंट आपको वेश्यालय के इतिहास के बारे में जानने का अवसर देगा. इसमें आप यह जान पाएंगे कि आखिर कैसे वे दीवारों के शहर में बस गये और आखिर ऐसा क्या हुआ, जो तवायफ़ें यहां से चली गईं?

GointheCity के गौरव शर्मा के मुताबिक, शाहजहानाबाद की संस्कृति में इन वेश्याओं का काफ़ी योगदान रहा है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेश्याओं को आश्रय देने वाले अपने बेटों को बोलने की कला सीखने के लिए उनके पास भेजते थे. इसलिए कल के वेश्यालय से आप आज की Grooming Classes की तुलना कर सकते हैं.

RV Smith ने अपनी किताब 'The Delhi That No One Knows' में लिखा है कि इस वेश्यालय की पठान और नीग्रो महिलाएं मार्शल आर्ट में ट्रेन्ड होतीं थी. वेश्यालय के गार्ड के रूप में इन्हीं ट्रेंड महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता था. यहीं की एक वेश्या फिरदौस जान इतनी सुंदर थी कि बड़े-बड़े ठाकुरों को भी उससे मिलने के लिए पहले अप्वाइंटमेंट लेना पड़ता था.

वैसे आप बल्लीमारान के पास गालिब की हवेली के बारे में ज़रूर जानते होंगे. साथ ही यह भी जानते होंगे कि ग़ालिब यहां किराए के मकान में रहते थे, जैसा कि इस किताब में भी ज़िक्र है. लेकिन बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि ग़ालिब यहां के मुज़रे करने वाली लड़कियों के नाच-गाने के बड़े शौकीन थे.

यह इवेंट मुज़रे वाली लड़कियों को लेकर पहले से मौजूद धारणाओं को स्पष्ट करने का एक बेहतर अवसर है. इतिहासकार Pran Nevile की किताब 'Nautch Girls of the Raj' का संदर्भ प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने कहा कि 'Nevile ने अपनी किताब में उस दौर को दिखाने की कोशिश की है, जिस दौर में कोठे पर जाना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था. शायद इसीलिए रामलीला और अन्य धार्मिक यात्राएं चावड़ी बाज़ार से होकर गुजरा करती थीं. कई युवा तो इस जुलूस में बस इसलिए शामिल होते थे ताकि वेश्यालयों की खिड़कियों से उन खूबसूरत वेश्याओं की एक झलक मिल जाए. उस वक़्त इस वेश्यालय की इतनी अहमियत थी.'

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लेकिन 1857 के बाद अंग्रेज़ों और बिपिन चंद्र जैसे समाज सुधारकों की कड़ी आलोचना के बाद नाच-गाना करने वाली तवायफ़ों की दुकान बंद होनी शुरू हो गई और इनका पलायन भी होने लगा. कहा जाता है कि 90 के दशक के शुरूआती दौर में ही ये अजमेरी गेट के आस-पास बस गईं और यहीं अपनी दुकान लगा ली. इसे ही आज जी.बी. रोड के नाम से जाना जाता है.

बहरहाल, यह आयोजन 31 अक्टूबर और 3-5 नवंबर तक चलेगा, जो नि:शुल्क नहीं होगा.

Source: hindustantimes