'दंगल' फ़िल्म की अभिनेत्री ज़ायरा वसीम के साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई. 17 साल की ज़ायरा ने बताया कि उनके साथ फ़्लाइट में छेड़छाड़ हुई. ज़ायरा ने चुप न रह कर इस घटना को सबके साथ शेयर करने का फ़ैसला किया और सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाल कर अपनी आपबीती बताई.

वीडियो में रोती हुई ज़ायरा को देख कर लोगों ने सहानुभूति जताई और ऐसी घटनाओं के प्रति आक्रोश दिखाया, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें ये ज़ायरा का पब्लिसिटी स्टंट लग रहा था.

ये असंवेदनशीलता का अलग स्तर तो है ही, ये इल्ज़ाम पीड़िता से ही पीड़िता होने का सबूत मांगने की मानसिकता का प्रमाण भी है. ज़ायरा अकेली नहीं हैं, महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में ये अकसर देखा जाता है.

जब कोई लड़की यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराती है तो उसे साबित करना पड़ता है कि उसका उत्पीड़न हुआ है. जब कि अन्य अपराधों के मामलों में ऐसा कम देखने को मिलता है. जब किसी के यहां चोरी होती है तो उससे लोग नहीं कहते कि साबित करो कि चोरी हुई है, लेकिन एक महिला से हर कोई पीड़िता होने का सबूत मांगता है.

इसका नतीजा ये होता है कि कई महिलाएं अपने साथ हुए अपराधों की शिकायत करने से कतराने लगती हैं, उन्हें पता होता है कि मुजरिम से पहले उन्हें ही कटघरे में खड़ा होना होगा और अपने साथ जो हुआ उसे साबित करना होगा. यही वजह है कि उत्पीड़न के कई मामलों की शिकायत ही दर्ज नहीं होती और मुजरिमों का मनोबल बढ़ता है.

जब छेड़छाड़ जैसे मामलों में ये रवैया अपनाया जाता है, तो ये इंसाफ़ की लड़ाई में पीड़िता का हौसला तोड़ने का काम करता है. एक व्यक्ति जो पहले ही किसी घटना से आहत है, उसे कटघरे में खड़ा कर देना उसे भावनात्मक रूप से तोड़ देता है.

जहां आम लड़कियों को अपने साथ हुए अपराध को साबित करने की प्रताड़ना से गुज़रना पड़ता है, वहीं अगर आप बॉलीवुड जैसे किसी पेशे से संबंध रखते हैं तो ये और बड़ी मुसीबत होता है. अकसर लोग उनकी शिकायत को पब्लिसिटी स्टंट का नाम दे देते हैं.

जब एक लड़की इस तरह के किसी के मामले के बारे में खुल कर बोलती है तो उसके लिए बहुत हिम्मत लगती है, उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है, उसके चरित्र पर ही सवाल उठा देने का डर हमेशा बना रहता है. ये समझना मुश्किल नहीं है कि पब्लिसिटी जैसी किसी चीज़ के लिए कोई भी लड़की इस मानसिक प्रताड़ना से नहीं गुज़रना चाहेगी.

अगर ज़ायरा की बात करें, तो वो बहुत छोटी उम्र में बड़ी सफलताएं पा चुकी हैं. उन्हें दुनिया पहचानती है, उनकी उम्र को देखते हुए उनकी उपलब्धियों की लिस्ट लम्बी है. इस कीमत पर उन्हें सस्ती पब्लिसिटी की शायद ज़रूरत भी नहीं है. इसलिए भी ये इल्ज़ाम कुंठित मानसिकता को दर्शाते हैं.

मुजरिम को खुद को निर्दोष साबित करने का मौका देना सही है, क्योंकि ये सम्भावना हमेशा रहती है कि कोई व्यक्ति निर्दोष हो, लेकिन कायदे से ये मेहनत आरोपी के हिस्से होनी चाहिए कि वो खुद को निर्दोष साबित करे.

एक समाज के तौर पर इतनी संवेदना हमें बचा कर रखने की ज़रूरत है कि एक पीड़िता से उसके पीड़िता होने का सबूत न मांगा जाये.