फ़िल्मों का वो दौर बीत चुका है, जब कहानी में एक शरीफ़-ईमानदार हीरो होता था, जिसे बेईमान-बदमाश गुंडे सताते थे. अब फ़िल्मी किरदार पहले से सजीव हो चुके हैं, उनके भीतर बुराईयां भी हैं और वो बेमतलब किसी का बुरा भी नहीं करते.

ये भी नहीं कि इसकी शुरुआत कोई 10-20 साल पहले हुई थी. फ़िल्मी पंडितों के हिसाब, से 1943 में रिलीज़ हुई अशोक कुमार की 'किस्मत' पहली Anti-Hero वाली फ़िल्म थी, तब ये फ़िल्म ब्लॉकबस्टर हुई थी. बॉलीवुड की पहली फ़िल्म, जिसने करोड़ रुपये का व्यापार किया था.

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बाद में भी Anti-Hero वाली फ़िल्में आती रहीं लेकिन मुख्यधारा अलग राह पर चल रही थी. इधर दो दश्कों से Anti-Hero या ग्रे शेड वाले किरदार ज़्यादा लिखे जा रहे हैं और लोगों को पसंद भी आ रहे हैं.

इन 20 सालों के दरमियां कुछ याद रखने लायक, कुछ छाप छोड़ने लायक फ़िल्मों और किरदारों को एक पृष्ट पर इकट्ठे लिखते हैं, जिनमें Anti-Hero किरदार को रेखांकित हों.

1. सत्या(1997)

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राम गोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित 'सत्या' को दश्क की सबसे ज़्याद प्रभावित करने वाली फ़िल्म माना जाता है. इस फ़िल्म ने मनोज वाजपाई और अनुराग कश्यप के करियर बनाने में अहम भूमिका निभाई. मनोज ने मुंबई के डॉन की भूमिका निभाई थी, तो अनुराग फ़िल्म के लेखकों में से एक थे.

2. फ़ना(2006)

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काजोल एक अंधी कश्मीरी लड़की है, जिसे दिल्ली में एक टूरिस्ट गाइड से प्यार हो जाता है, बाद में कहानी बताती है कि वो टूरिस्ट गाइड आतंकवादी है. आमिर ख़ान आतंकवादी की भूमिका में हैं, शायद ये उनकी ज़िंदगी की पहली फ़िल्म थी, जिसमें वो Anti-Hero की भूमिका में थे. इसे कुनाल कोहली ने निर्देशित किया था और लिखा था शिबानी भथिजा ने.

3. ओमकारा(2006)

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सेक्सपियर के नाटक 'ओथेलो' की कहानी पर आधारित विशाल भारद्वाज की इस फ़िल्म के लिए सैफ़ अली ख़ान की अदकारी की ख़ूब प्रशांसा की गई. इससे पहले उन्होंने अनगित ऐसे किरदार निभाए थे, जिन्हें 'White' शेड कहा जा सकता है. 'लंगड़ा त्यागी' के किरदार ने सैफ़ की झोली अवॉर्ड से भर दी थी.

4. फ़ैन(2016)

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शाहरूख वो पहले हीरो हैं जिन्होने Anti-Hero की छवी को ग्लैमर से जोड़ा. डर और बाज़ीगर आज भी लोगों के ज़हन में है. फ़ैन थोड़ी अलग किस्म की फ़िल्म है. एक फ़ैन के पागलपन के हद तक की दीवानगी की नकारात्मकता को शाहरूख ने पर्दे पर खींचा है. बॉक्स ऑफ़िस पर ये फ़िल्म कोई कमाल नहीं कर पाई.

5. Once Upon A Time In Mumbaai(2010)

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कहा जाता है कि इसकी कहानी या किरदार मुंबई अंडरवर्ल्ड के डॉन हाजी मस्तान और दाउद इब्राहिम जैसे दिखते हैं. एक मुंबई का डॉन है और दूसरा डॉन बनने की चाहत रखता है, दोनों के बीच का फ़र्क ईमान का है.

इमरान हाशमी का किरदार यहां विलेन जैसा प्रतीत होता है लेकिन उसके सामने भी एक डॉन है जो हीरो नहीं हो सकता, इसलिए दोनों किरदार Anti-Hero ही मालूम पड़ते हैं.

6. सात ख़ून माफ़ (2011)

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एक तो हिन्दी में डार्क कॉमेडी नहीं बनती और ऊपर से कोई महिला किरदार केंद्र में हो, इसकी संभावना और कम है. सात ख़ून माफ़ रस्किन बॉन्ड द्वारा लिखी गई शॉर्ट स्टोरी Susann's Seven Husbands से इंस्पायर्ड है. प्रियंका चोपड़ा इससे पहले 'एतराज़' फ़िल्म में इस शेड बख़ूबी दिखा चुकी थी, इसमें उनकी एक्टिंग कुछ और मंझी हुई दिखती है.

7. अंधाधुन (2018)

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पिछले साल जिन फ़िल्मों ने सबसे ज़्यादा प्रशंसा बटोरी, उसमें एक नाम अंधाधुन का है. कई अभिनेताओं ने अपने इंटरव्यू में ये इच्छा ज़ाहिर की कि काश वो इस फ़िल्म का हिस्सा होते! फ़िल्म में तब्बू ने 'निगेटिव किरदार' की एक्टिंग की एक अलग लकीर खींच दी. जैसे-जैसे वो मर्डर करते जाती, उसके किरदार से प्यार बढ़ता जाता.

8. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012)

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इस फ़िल्म को मॉर्डन डे कल्ट फ़िल्म का दर्जा प्राप्त हो चुका है. हालंकि बॉक्स ऑफ़िस पर इस फ़िल्म ने औसत प्रदर्शन ही किया था . लेकिन इस फ़िल्म की एक बड़ी फ़ैन फॉलोइंग है और इसकी वजह है इसके सभी किरदार, छोटे से छोटे और बड़े से बड़े किरदार वास्तिवक लगते हैं. साथ ही साथ डायलॉग ने कहानी में जो छौंका लगाया है, उसका स्वाद बहुत देर तक ज़ुबान पर रहता है.

9. कमीने(2009)

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शाहिद कपूर को एक अभिनेता का रूप में स्थापित करने का बड़ा श्रेय निर्देशक विशाल भारद्वाज को जाता है. 'कमीने' और 'हैदर' में शाहिद ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया है. कमीने में दो जुड़वां भाईयों की दुश्मनी को विशाल ने बहुत बारिकी से खींचा है.

10. पद्मावत (2018)

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इतिहास के जिस कहानी से ये फ़िल्म इंस्पायर्ड है, वो अपने आप में विवादित है, ऐसे में इसका भी विवादित होना लाज़मी है. फ़िल्म में एक तरफ़ राजा रतन सिंह हैं, उनके साथ रानी पद्मावती हैं और दूसरी ओर बर्बर अलाउदीन ख़िलजी. ख़िलजी के किरदार को रणवीर सिंह ने इतनी ईमानदारी और संजीदगी से निभाया है कि दर्शकों के ऊपर उसकी मज़बूत छवि बनी है.