समय की रफ़्तार के साथ प्रोग्रेस करना बेहद ज़रूरी है. वरना समय आपको पीछे छोड़ने में देरी नहीं करता. ये बात बॉलीवुड (Bollywood) पर भी पूरी तरह से लागू होती है. अगर पुराने और वर्तमान समय के बॉलीवुड में फ़र्क करें तो आपको बहुत बड़ा अंतर नज़र आएगा. वो समय गया जब दर्शक घिसे-पिटे कंटेंट पर भी तालियां पीटती नज़र आती थी. अब मूवीज़ की कहानियों में बड़े पैमाने पर बदलाव आया है. हालांकि, कंटेंट के मामले में अभी भी इस इंडस्ट्री को एक लंबा सफ़र तय करना है.

साल 2022 की शुरुआत से पहले हम चाहते हैं कि बॉलीवुड को फ़िल्मों में इन 11 चीज़ों को दिखाना बंद कर देना चाहिए-

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1. वो कैरेक्टर्स जो 'ना' का मतलब नहीं जानते.

जी हां, सच्चे प्यार का मतलब किसी पर अपनी ज़बरदस्ती चलाना नहीं होता. बॉलीवुड फ़िल्मों में दशकों से लड़कियों को उन लड़कों के प्यार में दिखाया जा रहा है जो उनका पीछा करते चले आ रहे हैं. असल ज़िंदगी में ऐसे लड़कों को बदले में प्यार तो नहीं पर एक रापटा ज़रूर मिलता है. डियर बॉलीवुड, फ़िल्मों में दो तरफ़ा रिलेशनशिप दिखाने में कोई बुराई नहीं है. 

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2. वो लड़के जो सिर्फ़ ख़ूबसूरत लड़कियों पर ही मरते हैं.

अब समय आ गया है कि हम 'कुछ कुछ होता है' और 'ये जवानी है दीवानी' जैसी फ़िल्मों में दिखाए जाने वाले रोमांस की दुनिया से बाहर आएं. इन मूवीज में लड़का चश्मा पहने एक लड़की को रिजेक्ट करता है. लेकिन जब वही लड़की एक ग्लैम मेकओवर में उसके सामने आती है तब उसे वो ख़ुशी-ख़ुशी एक्सेप्ट कर लेता है. इसका तो कोई सेंस नहीं बना.

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3. एक्ट्रेस को 'हीरो की दोस्त' के रूप में दिखाना.

सान्या मल्होत्रा और मृणाल ठाकुर जैसी एक्ट्रेस सिर्फ़ हीरो की गर्लफ्रेंड या बीवी का कैरेक्टर प्ले करने के लिए नहीं बनी हैं. उनमें इससे बेहतर रोल को करने की संभावनाएं हैं. 

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4. वो महिला जो एक आदमी को बेबी की तरह ट्रीट करती है. 

किसी आदमी की हर प्रॉब्लम को सुलझाना महिला का काम नहीं है. बॉलीवुड मूवीज़ को मर्दों का बच्चों जैसा बिहेवियर, टॉक्सिक मर्दानगी दिखानी बंद कर देनी चाहिए. चाहे वो 'ऐ दिल है मुश्किल' के रणबीर कपूर हों या 'कॉकटेल' के सैफ़ अली खान इस तरह के कैरेक्टर्स को समय के साथ अपडेट करने का वक्त आ गया है.   

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5. सीक्वेल में एक्टर्स को नए चेहरे के साथ रिप्लेस करना. 

हम सक्सेसफ़ुल मूवीज़ में कास्ट होने वाले नए एक्टर्स की बुराई नहीं कर रहे. बस इतना बता रहे हैं कि एक्टर्स जो एक मूवी को अपनी मेहनत से सुपरहिट बनाते हैं वो उस फ़िल्म के सीक्वेल में रहना डिज़र्व करते हैं. 

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6. कैरेक्टर्स का लड़कियों का पीछा करना बिल्कुल भी कूल नहीं है.  

बॉलीवुड को ये समझने की ज़रूरत है कि किसी ऐसे व्यक्ति को पसंद करना जो आपको भाव भी न डालता हो और उस पर नज़र रखना बिल्कुल भी कूल नहीं है. 'रहना है तेरे दिल में' और 'रांझना' जैसी मूवीज़ ये साबित करती हैं कि फ़िल्म मेकर्स को अब भी लगता है कि पीछा करने के आइडिया को रोमांस का नाम दे देना नॉर्मल है.

rehna hai tere dil mein
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7. साउथ फ़िल्मों की रीमेक

बॉलीवुड वाकई रीमेक बनाने में माहिर है. लेकिन ये इंडस्ट्री कब समझेगी कि आज की जनता ओरिजिनल कंटेंट और कहानियों की भूखी है?

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8. कॉलेज और स्कूल लाइफ़ का वो मेलोड्रामा जो हकीक़त से कोसों दूर है 

करण जौहर की फ़िल्मों में अवास्तविक घरों और कॉलेजों से शुरू हुआ चलन अब भी फिल्मों में ज़िंदा है. ख़राब कहानी के साथ बजट पर करोड़ों खर्च करना प्रशंसकों के लायक नहीं है. क्या हम प्यार और शादी पर और थोड़ी रियल अप्रोच अपना सकते हैं?

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9. एंटरटेनमेंट के लिए समुदायों की सुविधाजनक स्टीरियोटाइपिंग

गे कैरेक्टर्स का यू सिर्फ़ कॉमेडी के लिए करना, ये एक ऐसी चीज़ है जो हम नहीं चाहते हैं. कई फ़िल्मों में तो इन्हें मज़ाक के तौर पर भी कास्ट किया जाता है.

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10. उन एक्टर्स को रोल ऑफ़र करना जो बॉलीवुड ख़ानदान से ताल्लुक रखते हैं. 

जान्हवी कपूर, सारा अली खान, अनन्या पांडे को उनके डेब्यू अवार्ड मिल चुके हैं. लेकिन गीतिका विद्या ओहल्याण और सई ताम्हणकर जैसी एक्ट्रेसेस कहां हैं जो अभी भी एक ऐसी फ़िल्म के इंतज़ार में हैं जो उनकी ज़िंदगी बदल देगी.   

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तो क्यों न साल 2022 का स्वागत एक नए सिरे से किया जाए!