एक बेहतरीन फ़िल्म वो होती है, जो दर्शकों को कहानी के साथ बहा ले जाए. इस काम में कभी फ़िल्म की कास्ट तो कभी कहानी तो कभी दोनों ही मदद करते हैं. लेकिन कुछ ऐसी फ़िल्में भी होती हैं, जिनकी कहानी और कास्ट को भले ही दर्शक भूल जाएं, मगर उनमें फ़िल्माया गया कोई सीन ऐसा हो जाता है, जो लंबे समय तक ज़ेहन पर छाप छोड़ जाता है.

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ऐसे सीन्स जो हमें असहज कर दें, वो सीन्स जो जीवन के मुश्किल सच को बगैर किसी लीपापोती के हमारे आंखों के सामने पटक दें, वो सीन्स जो हमारे भीतर कभी एक अजीब से शांति तो कभी भूचाल पैदा कर दें.

हालांकि, हिंदी फ़िल्मों ऐसे सीन्स कम ही देखने को मिलते हैं, लेकिन ये जब भी होते हैं, तब दर्शकों के ज़हन पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं. आज हम ऐसे ही उन 10 ज़बरदस्त सीन्स पर बात करेंगे, जो साल 2000 से आज तक हिंदी फ़िल्मों में फ़िल्माए गए हैं.

1-एक हसीना थी- क्लाइमेक्स

श्रीराम राघवन का बॉलीवुड डेब्यू भारत में रिवेंज थ्रिलर्स के लिए एक बेहतरीन स्टैंडर्ड सेट कर गया. इस कहानी का प्लाट कुछ यूं है कि उर्मिला मातोंडकर (सरिता) के क़िरदार अपने धोखेबाज़ पति सैफ़ अली ख़ान (करन) से बदला लेती है, क्योंकि उसकी वजह से उसे जेल जाना पड़ता है, वो भी उस जुर्म में जो उसने कभी किया ही नहीं.

इस फ़िल्म का क्लामेक्स रोंगटे खड़े करने वाला था. क्योंकि बदला महज़ कोई हत्या या ख़ुद को निर्दोष साबित करवाने तक नहीं था. बल्कि सरिता अपना बदला लेने के लिए करन को एक गुफ़ा में बंद कर देती है. उसे जंज़ीरों से बांधकर ख़तरनाक चूहों का निवाला बनने के लिए छोड़कर चली जाती है.

2-हैदर- चौक सीन

इस फ़िल्म की कहानी कश्मीर के 90 के दशक पर बेस्ड है. फ़िल्म में शेक्सपियर के ‘To be or not to be’ को ‘हम हैं कि हम नहीं’ में जिस तरह बदला गया, उतनी ख़ूबसूरती के साथ शायद ही कभी बॉलीवुड में इस तरह का एडॉप्शन देखने को मिला हो. विशाल भारद्वाज निर्देशित इस फ़िल्म में हैदर (शाहिद कपूर), श्रीनगर के एक चौक पर खड़ाकर होकर AFSPA के ख़िलाफ़ स्पीच देता है. अजीब से चेहरे के भाव, अव्यवस्थित बोल एक अलग ही माहौल पैदा कर देते हैं. हंसने वाले हंसते हैं, लेकिन देखते ही देखते सबके भीतर एक ख़ामोशी भर जाती है. ये सीन शाहिद कपूरी की आज तक बेस्ट परफॉर्मेंस हैं.

ज़ाहिर तौर पर कश्मीर के लंबे राजनीतिक इतिहास को तीन मिनट के मोनोलॉग में दिखा पाना कोई आसान काम नहीं है. लेकिन जिस बेहतरीन अदाकारी के साथ शाहिद ने ये सीन किया, वो कहीं न कहीं हम सबके अंदर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर गया.

3- ब्लैक फ़्राइडे - बादशाह ख़ान का इंट्रोगेशन

1983 की मुंबई बॉम्ब ब्लास्ट पर हुसैन ज़ैदी की किताब पर आधारित ये फ़िल्म अनुराग कश्यप की अब तक की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है. एक से बढ़कर एक ज़बरदस्त एक्टर्स का जमावड़ा इस फ़िल्म में था. ब्लास्ट का आरोपी बादशाह ख़ान (आदित्य श्रीवास्तव) ख़ुद को मुंबई पुलिस के आगे सरेंडर कर देता है.

फिर उसकी मुलाकात इंट्रोगेशन रूम में एसीपी राकेश मारिया (के के मेनन) से होती है. कमरे में एकदम सन्नाटा. बेहद आराम से एसीपी, बादशाह ख़ान को पूछता है कि उसने ऐसा क्यों किया? जवाब आता है ‘मेरे क़ौम के लिए, अल्लाह हमारे साथ था’.

वो बोलता जाता है फिर के के मेनन का क़िरदार बताता है कि कैसे अल्लाह आतंकियों के बजाय जांच एजेंसियों के साथ था. कैसे बादशाह ख़ान जैसे लोग धर्म के नाम पर बेवकूफ़ बनते हैं. फ़िल्म के क़िरदार के मुंह से कहें तो ‘तुम चूतिये हो...हर वो आदमी जिसके पास कुछ नहीं है करने को वो धर्म के नाम पर चूतिया बनता रहेगा.’ के के मेनन के क़िरदार ने महज़ कुछ मिनट में उस हक़ीक़त को बयां कर दिया, जो हमारे समाज में आज भी फ़साद की जड़ बनी हुई है.

4-लव, सेक्स और धोखा- ऑनर किलिंग सीन

दिबाकर बनर्जी की लव, सेक्स और धोखे की कहानी 90 के दशक के रोमांस में एक ट्विस्ट पैदा करने वाली है. कहानी वैसी ही है, जिसमें एक ग़रीब लड़के को अमीर लड़की से प्यार हो जाता है, लेकिन अमीर लड़की के पिता इस रिश्ते के ख़िलाफ़ होते हैं. तो, गरीब लड़का और अमीर लड़की भागकर शादी कर लेता है. उसके बाद पापा जी को मनाने की कोशिश.

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पिता उनके पास पहुंचते हैं और घर आने को कहते हैं. दोनों को लगता है कि मामला तो एकदम ठीक हो गया. रास्ते में वो आराम से साथ में जा रहे होते हैं कि तब ही उनकी गाड़ी को लड़की के भाई एक गैंग के साथ रोक लेता है. लड़के और लड़की को कार से खींच लिया जाता है, और उन्हें मार दिया जाता है. 90 के दशक के रोमांस के साथ बनर्जी का चौंकाने वाला ट्विस्ट क़माल कर देता है.

दर्शक भी इस पर यक़ीन आराम से कर सकते थे क्योंकि अंशुमान झा और नुशरत बरुचा की कास्टिंग भी कुछ ऐसी थी. वो प्रेमी कपल जो प्यार में बस खोया है, जानता नहीं कि असल ज़िंदगी हिंदी फ़िल्मों की कोई सुनहरी कहानी नहीं है. फ़िल्म में बरुचा के भाई का किरदार निभाने वाले अतुल मोंगिया की अदाकारी तो दिल दहलाने वाली है. हैंडीकैम की नाइट-विज़न में मोंगिया की आंखें देखकर अच्छें-अच्छों की रूह कांप उठे.

5-अगली- एफ़आईआर सीन

एक पिता अपनी लापता बेटी की तलाश में एफ़आईआर दर्ज करने के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन जाता है. पुलिस स्टेशन में जो कुछ होता है, वो पहले तो हंसी पैदा करता है, लेकिन कहीं न कहीं हर शख़्स में बेचैनी भर देता है. शायद हम सभी को पुलिस का वो रवैया याद आ जाता है, जो आमतौर पर देखने को मिलता रहता है. मसलन, पुलिसवाला एफ़आईआर लिखवाने आए पिता से पूछता है कि उसका असली नाम और स्क्रीन पर नाम में अंतर क्यों हैं? कार में लड़की को अकेला क्यों छोड़ा? पत्नी को तलाक़ क्यों दिया? वो हर चीज़ पर बात करते हैं, जिसका केस कोई ताल्लुक नहीं है. जब बात केस पर होती है तो मक़सद मदद करना नहीं बल्कि उन्हें ही डाराना लगता है.

पुलिसवाले के क़िरदार में गिरीश कुलकर्णी की एक्टिंग देखने लायक है. पल में ग़ुस्सा और पल में मज़ाक करने वाले एक पुलिसवाले के क़िरदार को उन्होंने एक अलग ही लेवल पर निभा दिया. वहीं, राहुल भट और विनीत कुमार सिंह ने भी सिस्टम के आगे लाचार आम इंसान के भूमिका को बेहद सहजता से निभाया. फ़िल्म का ये सीन निराशा पैदा करता है. कानून की आम इंसान के परेशानियों से बेफ़िक्री उलझन पैदा करती है, लेकिन कलाकारों ने जिस तरीके से इसमें काम किया है, वो इस सीन को बेहद शानदार बना देती है.

6-तितली – फ़ैक्चर सीन

कनु बहल की इस फ़िल्म कहानी है दिल्ली के एक लूटेरे परिवार की, जिसके मुखिया डैडी (ललित बहल) हैं और उनके तीन बेटे विक्रम (रणवीर शौरी), बावला (अमित सयाल) और तितली (शशांक अरोड़ा) हैं. परिवार का बिजनेस सिर्फ लूटमार का है. इसी बीच तितली की शादी सहित कहानी में कई मोड़ आते हैं.

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ये फ़िल्म किसी भी तरह दर्शकों के एक सीन के लिए तैयार नहीं करती है, जिसमें क़िरदार का हाथ हथौड़े से बस इसलिए कूच दिया जाता है कि वो एक पेपर पर साइन न कर सके. इस सीन में शशांक अरोड़ा और शिवानी रघुवंशी का शानदार काम है. ज़्यादातर हिंदी फ़िल्मों में हिंसा के वक़्त इस्तेमाल होने वाला साउंड भी बेहद फ़िल्मी होता है. मसलन, गोली चली तो ढिश्कयां या घूसा पड़ा तो ढिशुम लेकिन कनु बहल इस सीन के ज़रिए दर्शकों को वास्तविक हिंसा से जुड़ा हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला एहसास होता है, उसके बेहद क़रीब ले जाते हैं.

7-बदलापुर – कंचन और हरमन के साथ रघु का माइंड गेम

इस फ़िल्म में श्रीराम राघवन (वरुण धवन) अपनी पत्नी और बेटे के हत्यारे, हरमन (विनय पाठक) और लिआक (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से बदला लेना चाहता है. फ़िल्म में एक सीन है, जहां रघु, हरमन और उसकी पत्नी कंचन (राधिका आप्टे) के साथ दोपहर के भोजन के लिए उनके घर आता है और फिर वो कंचन को हरमन के आगे बेडरूम में चलने के लिए मजबूर करता है.

फिर वो कमरे में कंचन को कपड़े उतारने और उसका नाम ज़ोर से ज़ोर से पुकारने के लिए कहता है ताकि हरमन को ऐसा लगा कि उसकी पत्नी सेक्स को एन्जॉय कर रही है. कमरे से बाहर आने के बाद कंचन हरमन को समझाती है कि उसके और रघु के बीच कुछ भी नहीं हुआ, लेकिन हरमन को यक़ीन नहीं दिला पाती. राधिका आप्टे और वरुण धवन की इस सीन में परफॉर्मेंस देखने लायक है.

8-तलवार - CBI’s Team 1 vs Team 2 सीन

मेघना गुलज़ार की ये फ़िल्म शायद हिंदी सिनेमा की पहली पोस्ट-ट्रुथ फ़िल्म है. इस फ़िल्म में एक सीन में सीबीआई की दो टीमें एक केस पर अपना-अपना निष्कर्ष बताती हैं. केस और निष्कर्ष दोनों ही सीरियस हैं, लेकिन क़िरदारों की अदायगी इसे बेहद मज़ाकिया अंदाज़ में बयां करती है. पहली टीम का मानना है कि सबूतों से छेड़छाड़ की गई थी, लेकिन मुख्य संदिग्ध क्लिनिक के कर्मचारी होंगे, दूसरी टीम को लड़की की हत्याय का शक उसके ही माता-पिता पर है.

विशाल भरद्वाज द्वारा आरूषि हत्याकांड पर लिखी गई ये कहानी दरअसल, आज के समय के ऐसे ध्रुवीकरण को दर्शाता है, जहां एक पक्ष को दूसरे पक्ष की बात मानने पर मजबूर कर दिया जाता है. ये सीन हमें एक झलक देता है कि न्याय तंत्र कितना बिखरा सा है और कभी-कभी ये कानून प्रवर्तन एजेंसियां अपने स्वयं के पक्षपाती, नैतिकता और निर्णय के आधार पर सिद्धांतों के साथ आने के दौरान अपनी खुद की ही कहानी का पीछा करती रहती हैं. वे वही देखते हैं, जो वो देखना चाहते हैं. इस बात को अनदेखा करते हुए कि सबूत क्या कह रहे हैं.

इस सीन को दिवंगत इरफ़ान ख़ान, प्रकाश बेलावादी, शिशिर शर्मा, सोहम शाह और अतुल कुमार जैसे कलाकारों की मौजूदगी ने बेहद दिलचस्प बना दिया.

9-रमन राघव 2.0 - कन्फ़ेशन सीन

अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में यूं तो कई ऐसे सीन हैं, जिनका ज़िक्र किया जा सकता है. लेकिन उनमें से एक सीन ऐसा है, जो फ़िल्म की सही मानो में जान है. शायद इसी वजह से फ़िल्म के ट्रेलर में भी उसे शामिल किया गया था. दरअसल, रमन (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) शहर में हो रही हत्याओं को लेकर ख़ुद को सरेंडर करने पुलिसवालों के पास जाता है. राघव (विकी कौशल) के साथ बाकी पुलिसवाले उसे सुनते हैं.

‘अपुन तो क्या है न साहब, पैदा ही निशाचर हुआ है…’ कुछ यूं रमन अपने बारे में बताना शुरू करता है. जिसके बाद वो शतरंज के खेल वाली सड़क पर चलने और हत्या करने की वजह सुनाता है. ये सीन जिसने भी देखा वो बस देखता रह गया. इस सीन में नवाज़ुद्दीन से अपनी नज़रे हटाना नामुमक़िन लगता है. सबसे ख़ास बात ये रही कि पूरे सीन में नवाज़ का चेहरा एकदम भोला लगता है, लेकिन उसके मुंह से निकलने वाले शब्द रोंगटे खड़े कर देते हैं.

10-गैंग्स ऑफ वासेपुर – पहलवान का मर्डर

ख़ैर इस फ़िल्म के बारे में क्या ही कहा जा सकता है. इसका हर सीन एकदम करारा है. जैसे कोई चाबुक चप्प-चप्प चलता है, वैसे इसके सीन एक के बाद एक आते रहते हैं. लेकिन एक सीन जिसपर शायद आपने भी गौर किया होगा, वो है सरदार ख़ान (मनोज वाजपेयी) जब एक पहलवान को मारने जाता है.

एक दुबले-पतले आदमी की एक पहलवान को मारने की मशक्कत देखनी हो, तो ये सीन ज़रूर देखिए. नुकीले-धारदार हथियार से एक के बाद एक कई वार, हथियार को शरीर में घुसाने और फिर बाहर खींचने में लगी ताकत को आप सरदार ख़ान के चेहरे पर देख पाएंगे. भरे बाज़ार में पहलवान का कत्ल और फिर उसके शरीर को कटते हुए देखना. कसाई ख़ाने के कचरे में उसकी लाश को फ़ेंक देना, ये वो सीन है, जो सरदार ख़ान के क़िरदार के वहशीपने को भी दर्शकों के सामने ले आता है.