'मेरा दिल आपका कोई हिंदुस्तान नहीं, जिसपर आप हुकुमत करें' (मुगल-ए-आज़म, 1960)   

बॉलीवुड के 'ट्रेजिडी किंग' दिलीप कुमार साहब नहीं रहे. हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार लंबे समय से कई बीमारियों से लड़े रहे थे. बिग़ड़ती हालात की वजह से वो कई बार अस्पताल में एडमिट हुए. पर हर बार वो स्वस्थ होकर वापस आ जाते थे. कुछ समय पहले ही जब उन्हें हिंदुजा अस्‍पताल में भर्ती कराया गया, तो लगा कि इस बार भी ठीक होकर वापस आ जायेंगे. अफ़सोस इस बार ऐसा नहीं हुआ. आज सुबह 7.30 बजे उन्होंने हिंदुजा अस्‍पताल में अंतिम सांस ली और सबको अलविदा कह चले गये.

दिलीप कुमार
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दिलीप साहब का जाना हिंदी सिनेमा के लिये एक बड़ा नुकसान है. अब शायद वो कभी लौट कर नहीं आएंगे, लेकिन हां जाते-जाते वो बहुत से ऐसे क़िस्से देकर गये हैं, जो उनके होने का एहसास करायेंगे.

1. दिलीप कुमार और सायरा बानो की फ़िल्मी प्रेम कहानी 

जब-जब लोग दिलीप साहब को याद करेंगे, उनकी और सायरा बानो की प्रेम कहानी भी ज़हन में आयेगी. दिलीप कुमार बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार थे. 9 साल की उम्र में सायरा बानो एक्टर को अपना दिल दे बैठी थीं. सायरा बानो का सपना था कि वो दिलीप साहब की पत्नी बनें. सायरा बानो के जन्मदिन पर उनकी और दिलीप साहब की मुलाक़ात हुई. दिलीप साहब ने सायरा बानो के प्यार को समझा और वो दिन आ ही गया, जब उन्होंने 44 साल की उम्र में 22 साल की अभिनेत्री को अपनी जीवनसंगिनी बना लिया.  

दिलीप कुमार और सायरा बानो
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2. मजबूरी में बन बैठे थे एक्टर  

दिलीप साहब पढ़ाई में एक एवरेज स्टूडेंट थे, उन्हें फ़ुटबॉल खेलने में काफ़ी दिलचस्पी थी. वो खालसा कॉलेज की तरफ़ से फ़ुटबॉल खेल कर 15 रुपये भी कमाते थे. एक दिन उनकी ज़िंदगी ने करवट ली और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनके पिता का फलों का बिज़नेस ठप्प हो गया. जिसके बाद उनकी पढ़ाई और फ़ुटबॉल दोनों छूट गई. घर चलाने के लिये उन्होंने मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर के तौर पर नौकरी की. इसके बाद क्लब में फलों का स्टॉल भी लगाया. पर ये काम भी ज़्यादा दिन नहीं चला. मुश्किल के दिनों में उन्होंने अपने पुराने दोस्त पृथ्वीराज कपूर से मुलाक़ात की और अपनी आपबीति सुनाई. परिवार चलाने के लिये वो फ़िल्मी दुनिया में आये और सुपरस्टार भी बन गये.  

सुपरस्टार दिलीप साहब
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3. जब 'ट्रेजिडी किंग' की वजह से बना क्रिकेटर का करियर 

दिलीप कुमार एक बेहतरीन अभिनेता थे. इसलिये उन्हें दूसरों की कला की कद्र थी. एक बार की बात है, दिलीप साहब ने पूर्व भारतीय बल्लेबाज़ यशपाल शर्मा को रणजी ट्रॉफ़ी मैच में बैटिंग करते देखा. इसके बाद उन्होंने BCCI से यशपाल शर्मा की सिफ़ारिश करते हुए कहा, यशपाल शर्मा पंजाब का लड़का है, वो काफ़ी टैलेंटेड है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खेल सकता है. दिलीप साहब की बात पर भरोसा जताते हुए BCCI ने यशपाल शर्मा को खेलने का मौक़ा दिया और खिलीड़ी ने भी 1983 के विश्वकप में अहम भूमिका निभाई.  

यशपाल शर्मा
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4. पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के लिये पाक पीएम से भिड़ गये थे 

करगिल युद्ध के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने युद्ध ख़त्म करने के लिये पाक पीएम नवाज़ शरीफ़ को फ़ोन किया था. फ़ोन पर उन्होंने अपनी लाहौर यात्रा और कारगिल युद्ध की कड़ी निंदा की. इसके बाद उन्होंने नवाज शरीफ़ से बात करने के लिये फ़ोन दिलीप साहब को दे दिया. उस समय दिलीप साहब ने अटल जी के लिये नवाज़ शरीफ़ को ख़री-खोटी सुनाई. इसके साथ ये भी कहा कि 'वो भी एक मुसलमान हैं. भारत-पाक के युद्ध से मुसलमानों में भय आ जाता है और घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है.'

प्रधानमंत्री अटल जी
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5. मधुबाला संग हुआ प्रेम कहानी का अंत 

दिलीप साहब ने अपनी आत्माकथा 'दिलीप कुमार- द सब्सटेंस एंड द शैडो' में उनकी और अभिनेत्री मधुबाला की प्रेम कहानी का ज़िक्र किया है. दिलीप साहब और मधुबाला एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे. मधुबाला के पिता भी चाहते थे कि दोनों की शादी हो, लेकिन उसके साथ वो ये भी चाहते थे कि दोनों स्टार उनके प्रोडक्शन की फ़िल्म्स करते रहें. ये बात दिलीप साहब को मंज़ूर नहीं थी. 'मलमल' की शूटिंग के दौरान दिलीप साहब ने मधुबाला से कहा, 'चलो आज शादी कर लेते हैं. उन्होंने ये कभी कहा कि अगर आज नहीं चलीं, तो कभी तुम्हारे पास लौट कर नहीं आऊंगा.' उस दिन मधुबाला नहीं गईं और उसके बाद दिलीप साहब उनके पास कभी नहीं गये.

मधुबाला
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6. जेआरडी टाटा और दिलीप साहब की ख़ास मुलाक़ात 

दिलीप साहब ने अपनी बायोग्राफ़ी में उनकी और जेआरडी टाटा की मुलाक़ात का ज़िक्र भी किया है. दिलीप लिखते हैं कि एक बार वो एयर इंडिया फ़्लाइट से सफ़र कर रहे थे. उनके बगल वाली सीट में एक साधारण से बुज़ुर्ग बैठे हुए थे, जो उनकी मौज़दूगी से एकदम बेख़बर थे. दिलीप साहब ने बुज़ुर्ग से पूछा कि क्या वो उनकी फ़िल्म देखते हैं? इस पर उन्हें जवाब मिला, हां थोड़ी बहुत. कई साल पहले एक फ़िल्म देखी थी. सफ़र ख़त्म हुआ, तो दिलीप साहब ने बुज़ुर्ग को अपना परिचय दिया और बुज़ुर्ग ने भी बताया कि वो जेआरडी टाटा हैं. इस क़िस्से पर दिलीप साहब ने कहा कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि आप कितने बड़े इंसान हैं. दुनिया में हमेशा आपसे बड़ा इंसान मौजूद रहता है.  

जेआरडी टाटा
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दिलीप साहब का जाना सिनेमा जगत और इंसानियत दोनों के लिये बड़ी हानि है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जायेगी. 'जो लोग सच्चाई की तरफदारी की कसम खाते हैं. ज़िन्दगी उनके बड़े कठिन इम्तिहान लेती है'. इसी डायलॉग्स के साथ बेहतरीन अभिनेता को हमारी और हमारी टीम की तरफ़ से श्रद्धाजंली.