‘भाईसाहब इस देश के हर घर में एक बेटी बैठी है, जिसका दहेज कम पड़ रहा है. और बस इस उम्मीद में कि वो छाती ठोक कर उसे विदा कर सके, उसका बाप-भाई हड्डियां गला रहा है.’

अक्षय कुमार (Akshay Kumar) समाज के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं. जब देखो वो एक नया मुद्दा उठा लेते हैं. चलो उठा लो, मगर अच्छे सिनेमा से विश्वास तो न उठवाओ. मतलब खिलाड़ी कुमार की फ़िल्में देख कर पहले से ही आंखें झुलसी हैं, ऊपर से अब वो फ़िल्म रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) के नाम पर नया रायता दर्शकों के आगे परोसने आ गए.

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रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) का ट्रेलर (Trailer) रिलीज़ हो गया है. फ़िल्म आपको जो कहानी बताएगी, वो तो थियेटर में 11 अगस्त को अपनी ज़िम्मेदारी पर देखो. मगर हमारे इस पोस्टमार्टम थियेटर में ट्रेलर की परत दर परत चीरफाड़ की जाएगी. 

तो ट्रेलर की शुरुआत भूमि पेडनेकर के मिमियाते डायलॉग से होती है. ‘बचपन से इंतज़ार कर रही हूं तुम्हारे से शादी करने की, लेकिन तुम्हें तुम्हारी बहनों के सामने कुछ दिखता ही नहीं है. बताओ बारात कब लाओगे मेरे घर?’

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Raksha Bandhan

बस ये एक डायलॉग ही काफ़ी है समझने के लिए कि डायरेक्टर की ज़िंदगी का एक हई मक़सद है, भूमि की शादी करना. अब वो पूरी फ़िल्म में अपनी बारात के लिए ही इधर-उधर नाचती घूमेंगी. इसलिए इनको थोड़ा किनारे कर आगे बढ़ते हैं. क्योंकि, फ़िल्म में शादी को सिर्फ़ वही नहीं तरसी हैं. अक्षय भी सेम टू सेम बेचैनी छाती में दबाए हैं. अपनी शादी की नहीं, वो तो ठरक बंदे में है ही. यहां वो अपनी चार बहनों को ‘निपटाने’ में लगे हैं.

जी हां, निपटाने में. काहे कि ट्रेलर देख कर यही महसूस हो रहा है. क्योंकि, कबाड़ी वाला भी अक्षय को अपनी बहनों के लिए दूल्हा नज़र आ रहा. मगर भारत में शादी क़ुबूल बाद में होती है, पहले दहेज का बबूल झेलना पड़ता है. ये फ़िल्म भी ऐसे ‘नए विषय’ पर बनी है. 

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ट्रेलर में नज़र आ रहा है कि अक्षय अपनी बहनों के शादी के दहेज में डिस्काउंट मांग रहे. इतना ही नहीं, वो एक बहन की शादी के लिए अपनी दुक़ान तक गिरवी रख दे रहे. यहां तक, वो मुस्कुराते हुए डायलॉग मार रहे कि बाकी बहनों के लिए अपनी किडनी तक बेच देंगे.

देखो अक्षय भाई, बेचेंगे तो आप सिर्फ़ फ़िल्म के टिकट ही. ट्रेलर में तो खाली ये फ़र्ज़ी के इमोशन बेच रहे. मगर इससे हमें परेशानी नहीं. दिक्कत तो ये है कि फ़िल्म में लड़िकयों के अंदर शादी को लेकर अजीब सी तड़प दिखाई गई है. इतनी कि वो अपनी किस्मत को ही कोस रही हैं. फ़िल्म की एक बहन का डायलॉग देखिए.

‘किस्मत से ज़्यादा और वक़्त से पहले कुछ नहीं होगा भइया. मेरी और इन तीन लड़कियोंं की किस्मत में ही कुछ कमी है.’

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हां बहन. सच में कुछ नहीं होगा ऐसी ख़राब डायलॉग बाज़ी से. रोने के बजाय केवल हंसी छूंटेगी लड़कियों की. काहे कि अपनी शादी में नागिन डांस देखने के अलावा भी उनकी ज़िंदगी में बहुत कुछ है करने को. नौकरी, प्यार, बवाल… सबकुछ. और रही बात बाप-भाइयों की तो उन पर लड़कियों को बोझ दिखाने के बजाय, कंधे से कंंधा मिलाकर चलने वाली लड़की दिखाते तो बेहतर होता. 

ख़ैर, हमारा समझना बेकार है. इतना आधुनिक ज्ञान पेलेंगे, तो फिर फ़िल्म कैसे बनेगी. तो चलो, सोचते हैं कि आख़िर इसकी कहानी कहां पहुंचेगी. दो-तीन विचार हैं मेरे. 

हालांकि, उसके पहले ये Raksha Bandhan का ट्रेलर देख लो.

अक्षय फ़िल्म में दहेज जुगाड़ते-जुगाड़ते थक जाएंगे. एक दिन समाज को धकापेल गरिएंगे और फ़िल्म का मैसेज चला जाएगा.

अक्षय की बहनोंं को प्यार हो जाएगा और वो लड़के दहेज नहीं मांगेंगे.

बहनोंं को प्यार होगा, मगर अक्षय को मंज़ूर नहीं होगा. इस चक्कर में नया ड्रामा क्रिएट होगा. फिर बहने अक्षय को दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ कुछ ज्ञान देंगी.

बहने शादी करने से इन्कार कर देंगी. अक्षय के मुंह पर कोहनी मारेंगी और समाज को कहेंगी, ‘गुड नाइट का बोर्ड लगाओ’

अब देखो भइया, होने को कुछ भी हो सकता है. अपन तो फ़िल्म Raksha Bandhan के रायटर है नहीं. होते तो फ़िल्म की इस तरह से कहानी लिखते ही नहीं. हां, अब अगर आप सोच रहे हैं भूमि पेडनेकर का क्या होगा, तो शर्तिया उनका बचपन का सपना पूरा होगा. वो पल्ले अक्षय के ही पडे़ंगी. फिर पूरी ऑडियंस कहेगी, ‘जैसे उनके दिन बहुरे वैसे सबके दिन बहुरें’