Chola Dynasty: मणिरत्नम की फ़िल्म PS-1 (पोनियन सेलवन पार्ट 1) 30 सितंबर को रिलीज़ होगी. क़रीब 500 करोड़ रुपये की लागत से बनी ये पैन इंडिया मूवी कल्कि कृष्णामूर्ति की Ponnyine Selvan नॉवेल पर बेस्ड है. ये एक काल्पनिक नॉवेल है, जो दक्षिण भारत के चोल राजवंश (Chola Dynasty) और उसके पराक्रमी सम्राट Arulmozhi Varman की ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूमती है. जो बाद में महान चोल सम्राट राज राजा चोल के नाम से जाने गए.

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अब आप फ़िल्म देखें उसके पहले आपको चोल राजवंश के बारे में जान लेना चाहिए. क्योंकि, भारत के महानतम राजवंश में से एक होने के बाद भी लोग इससे कम परिचित हैं.

Chola Dynasty: 400 साल से ज़्यादा किया शासन

9वीं शताब्दी में पल्लवों का हराकर चोल राजवंश स्थापित हुआ. विजयालय चोल को इस राजवंश की स्थापना का  श्रेय दिया जाता है. तंजौर इनकी राजधानी थी. 13वीं सदी में जब तक पाड्यों का आगमन नहीं हुआ, तब तक चोल राजवंश फलता-फूलता रहा. ये दुनिया में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजवंश था.

चोलों ने क़रीब-क़रीब पूरे दक्षिण भारत को जीत लिया था. भारत के बाहर जैसे श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया में भी उन्होंने कब्जा जमाया था. चोल के कूटनीतिक संबंध म्यांमार, चीन तक पहुंच गए थे. चोल साम्राज्य समुद्र में भी काफ़ी शक्तिशाली था. उनके पास कई जहज थे, जिनकी मदद से उन्होंने बहुत से टापुओं को जीता था.

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पूरे तमिल राज्य पर इनका राज था. इस बीच कई चोल शासक आए और गए. परांतक प्रथम के शासन के वक्त चोल वंश को राष्ट्र कूट शासक कृष्ण तृतीय ने टक्कर दी. चोल सम्राट को परास्त किया. जिससे चोल शासक की नींव हिल गई थी. तभी कृष्ण तृतीय की मौत और राष्ट्र कूटों के पतन के बाद चोल फिर खड़े उठे और सालों तक राज करते रहे. चोल वंश के सबसे महान शक्तिशाली राजा थे Arulmozhi Varman, जिन्हें राज राजा चोल प्रथम घोषित गया. वे इस साम्राज्य को शिखर तक ले गए. बता दें, विजयालय, आदित्य 1 और राजेंद्र चोल इस राजवंश के कुछ महान शासक हुए.

कला-संस्कृति का काफ़ी विकास हुआ

चोलों के शासनकाल (Chola Dynasty) में समाज और संस्कृति में बड़े पैमाने पर विकास हुआ. इस युग में मंदिर सभी सामाजिक और धार्मिक बैठकों का मुख्य केंद्र था. युद्ध और राजनीतिक हंगामे के समय में भी ये एक सुरक्षित स्थान था. श्रीरंगम मंदिर इस युग से एक आकर्षण है.

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इस काल में कला, धर्म और साहित्य को बहुत लाभ हुआ. कावेरी नदी के किनारे कई शिव मंदिर बनाए गए थे. बृहदेश्वर मंदिर, राजराजेश्वर मंदिर, गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर जैसे चोल मंदिरों ने द्रविड़ वास्तुकला को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. चोलों के बाद भी मंदिर वास्तुकला का विकास जारी रहा.

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चोलों के शासन (Chola Dynasty) के दौरान मूर्तिकला अपने चरम पर पहुंच गई थी. चोल मूर्तिकला का एक महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन तांडव नृत्य मुद्रा में नटराज की मूर्ति है. बता दें, चोल कांस्य प्रतिमाओं को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमाओं में से एक माना जाता है.