90 के दशक में आई फ़िल्म 'तेज़ाब' का बब्बन याद है, जिसने अनिल कपूर के लिए अपनी जान दे दी थी. जिन्हें याद है वो भी और जिन्हें नहीं याद उन्हें भी बता दूं कि वो थे चंकी पांडे. 80 और 90 के दशक में आए चंकी पांडे ने तेज़ाब, आग ही आग और आंखें जैसी सुपरहिट फ़िल्में दीं. दर्शकों ने उनके अभिनय को सराहा भी, लेकिन वो हिंदी फ़िल्मों में वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए.

Chunky pandey
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चंकी पांडे ने पर्दे पर अपने किरदार से दर्शकों को हंसाया है उनके हर किरदार में थोड़ा मज़ाकिया अंदाज़ होता ही था. वैसे ही कुछ मज़ाकिया उनकी ज़िंदगी की कहानी भी है. उनको फ़िल्म 'आग ही आग' में रोल जैसे मिला वो भी बड़ा मज़ेदार क़िस्सा है. हुआ ये था कि वो बाथरुम में पहलाज निहलानी को देखकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लग गए कि मेरा नाड़ा नहीं खुल रहा तब पहलाज निहलानी ने उनका नाड़ा खोला. उसी दौरान दोनों ने एक फ़िल्म भी डिस्कस कर ली और उन्हें अपनी पहली फ़िल्म मिल गई.

Bollywood actor
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भले ही चंकी को फ़िल्म आसानी से मिली हो, लेकिन हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाना उनके लिए बहुत मुश्किल था. जब वो ऐसा करने में असफ़ल रहे तो उन्होंने बांग्लादेशी सिनेमा की ओर अपना रुख़ कर लिया. वहां उन्होंने 'स्वामी केनो असामी', 'बेश कोरेची प्रेम कोरेची', 'मेयेरा ए मानुष' जैसी सुपरहिट फ़िल्में दीं और वो स्टारडम हासिल किया जो वो यहां नहीं कर पाए.

Actor
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एक अभिनेता के तौर पर चंकी पांडे ने साबित कर दिया कि जब तक पर्दा गिरे नहीं तब तक एक अभिनेता को रुकना नहीं चाहिए और चंकी भी नहीं रुके. उन्होंने फिर से एक बार बड़े पर्दे पर दस्तक दी और इस बार सारा खेल पलट चुका था. जिस चंकी पांडे को हिंदी सिनेमा छोड़ना पड़ा था, आज उन्हीं को लोगों ने स्वीकार कर लिया था. उनके रोल को पसंद किया.

Beghum jaan
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उन्होंने हाउसफ़ुल की सीरीज़ में आखरी पास्ता का किरदार निभाया और इनका डायलॉग 'मामा मिया...' बहुत फ़ेमस हुआ. इसके अलावा बेग़म जान का कबीर हो या, साहो का देवराज या प्रस्थानम का गैंग्सटर काली इन्होंने सब किरदारों को बाख़ूबी निभाया.

उन्होंने बताया,

विलेन के रोल के लिए उन्हें ऋषि कपूर ने प्रोत्साहित किया था.
Saaho
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चंकी ने सभी एक्टर और एक्ट्रेस के लिए एक बात कही कि स्टारडम हासिल करने के बाद काम न मिलना बहुत मुश्किल दौर होता है. ये स्थिति आपको डिप्रेशन तक ले जाती है. इसलिए इस स्थिति में सर्वाइव करने के लिए ख़ुद को बिज़ी रखना चाहिए. रोल छोटा हो या बड़ा कर लेना चाहिए, क्योंकि इस स्थिति से आपको वही काम निकाल सकता है, जो आपको अच्छा लगता हो. जब मैं इस दौर में था, तो मैंने एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी और एक रेस्टोरेंट चालू किया और ख़ुद को बिज़ी रखा.

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आपको बता दें, साल 1988 में आई फ़िल्म 'तेज़ाब' के किरदार के लिए चंकी पांडे को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिल चुका है.

आज चंकी पांडे का जन्मदिन है उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं और आप ऐसे ही फ़िल्में करते रहें.

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