दादा साहब फाल्के को हिंदी सिनेमा का जनक कहा जाता है. 1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' नाम की पहली बॉलीवुड फ़िल्म रिलीज़ हुई थी वो इन्होंने ही बनाई थी. इस फ़िल्म को बनाने के लिए उन्होंने काफ़ी सारे तिकड़म लगाए थे और कई जुगाड़ भी किए. मसलन प्रोड्यूसर न मिलने पर उधार लेना और एक्ट्रेस का रोल निभाने के लिए जब कोई महिला तैयार नहीं हुई तो पुरुषों से ही महिला की एक्टिंग करवाना.

मगर जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इसने न सिर्फ़ दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया, बल्कि हिंदी फ़िल्म जगत की ऐतिहासिक शुरुआत भी कर दी थी. आज अगर बॉलीवुड विश्व की सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ में गिना जाता है तो इसका श्रेय दादा साहब फाल्के को ही जाता है.

Dadasaheb Phalke
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वो एक महान एक्टर-डायरेक्ट-राइटर और प्रोड्यूसर थे. दादा साहब फाल्के को वन मैन आर्मी कहना ग़लत न होगा. उन्हीं के नाम पर हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा अवॉर्ड दादा साहब फाल्के अवॉर्ड दिया जाता है. उनको फ़िल्म बनाने का आइडिया कैसे और क्यों आया चलिए आज आपको विस्तार से बताते हैं.  

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दादा साहब फाल्के का असली नाम धुंधिराज गोविंद फाल्के था. उन्हें बचपन से ही फ़ोटोग्राफ़ी करने का शौक़ था. इसलिए उन्होंने महाराजा सायाजीराव यूनिवर्सिटी से चित्रकला के साथ फ़ोटोग्राफ़ी की शिक्षा हासिल की. 1910 में उन्होंने ‘द लाइफ़ ऑफ़ क्राइस्ट' नाम का एक चलचित्र यानी कि एक फ़िल्म देखी. इसे देखने के बाद उन्हें अपनी आंखों पर य़कीन ही नहीं हुआ कि चित्र भी चल सकते हैं.

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इस फ़िल्म से जुड़ी सारी जानकारी उन्होंने हासिल की. इसके बाद उन्होंने तय किया कि वो भी एक फ़िल्म बनाएंगे. उस मूवी को देखने के बाद दादा साबह फाल्के ने उस दौरान रिलीज़ हुई बहुत सी फ़िल्में देख डाली. मूवी बनाने के लिए टेक्निकल नॉलेज हासिल करने के लिए लंदन भी गए थे. यहां से वो फ़िल्म मेकिंग की बारिकियों को समझ कर लौटे.

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भारत वापस आने के बाद दादा साहब फाल्के ने जब तय कर लिया कि वो किस सब्जेक्ट पर फ़िल्म बनाएंगे तो वो इसके लिए फ़ंड जुटाने की तलाश में जुट गए. जब किसी ने साथ नहीं दिया तो उन्होंने पत्नी से उधार लेकर फ़िल्म निर्माण का काम शुरू किया. उस समय फ़िल्म का बजट लगभग 15 हज़ार रुपये रहा होगा. महिलाओं के रोल के लिए एक्ट्रेस नहीं मिली तो पुरुषों से ही रोल करवा लिया. 

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पहली फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने के बाद दादा साहब फाल्के रुके नहीं. वो एक के बाद एक फ़िल्में बनाते गए और फ़िल्मों से जुड़े प्रयोग भी करते रहे. अपने करियर में दादा साहब फाल्के ने लगभग 97 फ़िल्में बनाईं और 27 शॉर्ट मूवीज़. उनके हुनर ने ही हिंदी सिनेमा को विश्व सिनेमा के पटल पर एक नई पहचान दिलाई थी. उन्हें हिंदी सिनेमा का पितामह भी कहा जाता है. 

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इसलिए सरकार हर साल फ़िल्मों में आजीवन उल्लेखनीय काम करने वाले कलाकार को उनके नाम पर ही दादा साहब फाल्के अवॉर्ड देती है. 1969 में इसकी शुरुआत हुई थी. सम्मानित होने वाले व्यक्ति का नाम एक ज्यूरी तय करती है. सबसे पहला दादा साहब फाल्के अवॉर्ड मशहूर एक्ट्रेस देविका रानी को मिला था.

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दादा साहब फाल्के द्वारा बनाई गई कुछ फ़ेमस फ़िल्में हैं 'भस्मासुकर मोहिनी', 'लंका दहन', 'सावित्रि', 'श्रीकृष्ण जन्म', 'गंगावतरण'. उन्होंने फ़िल्मों को बनाने के लिए कितना संघर्ष किया था. इस पर एक फ़िल्म बनी है जिसका नाम है 'हरिश्चंद्राची फ़ैक्टरी'. इस मूवी में दादा साहब फाल्के के जीवन को क़रीब से जानने का मौक़ा मिलेगा. इसे देख कर आपको समझ आ जाएगा कि क्यों भारतीय सिनेमा के इतिहास में आज भी सुनहरे अक्षरों में लिखा है.

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