न तड़कता-भड़कता सेट, न खूबसूरत लड़के-लड़कियां, न महंगी साड़ियां और न ही सपनों की कोई हसीन दुनिया, जिनमें इश्क़ किसी की परवाह किये बगैर उड़ान भरता है. अब कोई निर्माता या कहानीकार इन जैसे किसी विषय पर फ़िल्म बनाने को कहे, तो निर्देशक बिना किसी टालमटोल के साफ़-साफ़ इंकार कर देगा. क्योंकि फ़िल्मों का पर्याय ही इन चीज़ों से शुरू होता है और इन पर ही जा कर खत्म होता है.

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सारांश, सुबर्णरेखा, गोदान और गर्म हवा जैसी फ़िल्में इनके सामने एक अपवाद पेश करती हैं, पर ऐसे कितने निर्देशक रहे हैं, जिन्होंने लीक से हट कर फ़िल्में बनाने का साहस जुटाया? शायद एक, दो या चंद ऐसे नाम, जिन्हें हम उंगलियों पर भी गिन लें.

ऐसे ही गिने-चुने डायरेक्टर्स में से एक हैं श्याम बेनेगल, जिन्होंने ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनाई, जिन पर कोई शायद ही कोई डायरेक्टर हाथ लगाने की सोचेगा. बड़े-बड़े ब्रांड्स के लिए विज्ञापन लिखने वाले श्याम बेनेगल ने जब मुम्बई में पहली बार कदम रखा, तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि विज्ञापन में महंगी गाड़ियां और सुंदर लड़कियां दिखाने वाला ये शख़्स कभी ‘अंकुर’ जैसी इमारत को खड़ा करके हिंदी फ़िल्मों के मायने बदलेगा.

लोगों की अकसर शिकायत रहती है कि जब कोई फ़िल्मकार साहित्य पर कोई फिल्म बनाता है, तो उसमें साहित्य के मूल्यों की हत्या कर देता है, पर शायद ऐसे लोगों ने श्याम बेनेगल की फ़िल्में नहीं देखी, जिनमें साहित्य के किरदारों की तरह फ़िल्मों के किरदारों का खुद से द्वन्द्व होता है. अब जैसे धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ को ही ले लीजिये, जिसकी जमुना को श्याम बेनेगल बिना कोई छेड़छाड़ किये पर्दे पर ले कर आये और नेशनल अवार्ड की सीढियां चढ़े. अपना 82वां जन्मदिन मना रहे श्याम बेनेगल अपने दोस्तों के बीच श्याम बाबू के नाम से पहचाने जाते हैं, जिसकी हर फ़िल्म गुरुदत्त की फ़िल्मों की फ़िल्मों की तरह आखिर में सोचने को मजबूर कर देती है.

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आज दुनिया भर में लोग एयरकंडीशन वाले ऑफिस में बैठ कर महिला अधिकारों की बातें करते हुए फेमिनिस्ट होने का ढिंढोरा पिटते हैं. पर अपनी फिल्मों के ज़रिये श्याम बेनेगल समाज की उस स्त्री के साथ खड़े नज़र आते हैं, जो कभी घर की चारदीवारी में कैद हो कर सेक्स की चाहत रखती हुई दिखाई देती है, तो कभी कोठे पर अपनी लाज बचाने के लिए संघर्ष करती हुई नज़र आती है.

ये श्याम बेनेगल की सिनेमा की समझ ही है, जिसने उनके पुरस्कारों की लिस्ट में पद्म श्री से लेकर पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के अवार्ड में शामिल हैं.

सिनेमा के 100 साल पूरे होने के बावजूद श्याम बेनेगल का नाम उन डायरेक्टर्स की लिस्ट में शुमार है, जिन्हें भारतीय सिनेमा का आधार स्तंभ कहा जा सकता है. समानांतर के साथ-साथ व्यवसायिक सिनेमा पर भी उनकी छाप देखने को मिलती है