भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) को क़रीब 110 साल हो चुके हैं. लेकिन आज भी इंडस्ट्री में पुरुषों का ही दबदबा ज़्यादा है. आज भी फ़िल्म में हीरो ही सब कुछ होता है. हीरोइन से बड़ा रोल हीरो का होता है. हीरोइन के मुक़ाबले हीरो को ज़्यादा पैसे दिए जाते हैं. हालांकि, आज इंडस्ट्री में महिलाओं की भागीदारी काफ़ी बढ़ गयी है. एक्टिंग ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड के अन्य कार्यों निर्देशन, कोरियोग्राफ़ी, राइटिंग, प्रोडक्शन में हर जगह आज लड़कियों की भागीदारी बढ़ चुकी है.

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आज से दशकों पहले ऐसा नहीं था. 50 से 90 के दशक तक सिनेमा जगत में अभिनेत्रियों के अलावा महिलाओं का अन्य कार्यों में भागीदारी न के बराबर थी. ऐसे में इस धारणा को फ़ातमा बेगम (Fatma Begum) ने तोड़ा था. फ़ातमा ने भारतीय सिनेमा को अपना बहुमूल्य योगदान दिया. उन्होंने फ़िल्मों में अभिनय के अलावा निर्देशक और राइटर के तौर पर भी अपना दमखम दिखाया. इस दौरान उन्होंने भारतीय सिनेमा जगत के कई बड़े नामों के साथ काम किया था. 

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फ़ातमा बेगम (Fatma Begum) को आज भारतीय सिनेमा जगत की पहली महिला निदेशक के तौर पर याद किया जाता है. चलिए आज आपको बॉलीवुड की मशहूर नायिका व निर्देशक फ़ातमा बेगम की ज़िंदगी से रूबरू कराते हैं.  

कौन थीं फ़ातमा बेगम? 

फ़ातमा बेगम का जन्म 1892 में सूरत के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था. वो बचपन से फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना करियर बनाना चाहती थी. लेकिन एक कंज़र्वेटिव मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाली फ़ातमा के लिए ये आसान नहीं था. 1910 के दशक में भारतीय सिनेमा में महिलाएं महज एक अभिनेत्री के तौर पर ही इंडस्ट्री में अपना करियर बना सकती थीं. इसके अलावा अन्य कार्यों में केवल पुरुषों का ही दबदबा था. मगर, फ़ातिमा ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने शुरुआत में उर्दू मंचों से अपनी क़ाबलियत दिखानी शुरू की. 

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इस बीच फ़ातमा बेगम ने नवाब इब्राहीम मोहम्मद याकूत ख़ान से शादी कर ली. लेकिन कुछ ही साल बाद उनका तलाक भी हो गया. फ़ातमा और याकूत की 3 बेटियां जुबैदा, सुल्ताना और शहजादी थीं. पति से अलग होने के बाद फ़ातमा ने तीनों बेटियों बच्चों की परवरिश अकेले ही की थी. फ़ातिमा बेगम की तीनों बेटियां 1920 से 1936 के बीच भारतीय मूक (साइलेंट) फ़िल्मों की अभिनेत्रियां थीं.  

1922 में की थी पहली फ़िल्म  

फ़ातमा बेगम ने नाटक मंचों से अपने अभिनय की शुरुआत की थी. इसके कुछ साल बाद उन्होंने प्रसिद्धि हासिल कर ली. सन 1922 में उन्होंने बतौर निर्देशक 'वीर अभिमन्यु' फ़िल्म से भारतीय सिनेमा जगत में प्रवेश किया. ये एक मूक (साइलेंट) फ़िल्म थी, जिसके निर्माता अर्देशिर ईरानी थे. इस फ़िल्म के साथ ही उन्होंने इतिहास में अपना नाम बॉलीवुड की पहली महिला निर्देशक के तौर पर दर्ज करवा लिया था. 

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इन फ़िल्मों में दिखाया एक्टिंग का दम  

सन 1924 में फ़ातमा बेगम ने बतौर एक्ट्रेस 'सीता सरदावा', 'पृथ्वी बल्लभ', 'काला नाग' और 'गुल-ए-बकवाली' जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेरा. इसके बाद सन 1925 में 'मुंबई नी मोहनी' फ़िल्म में अपनी दमदार अदाकारी से हर किसी का दिल जीतने में क़ामयाब रहीं. सन 1926 में फ़ातमा बेगम ने ख़ुद की फ़िल्म कंपनी शुरू की, जिसका नाम 'फ़ातमा फ़िल्म्स' रखा गया. सन 1928 में उन्होंने इसका नाम बदलकर 'विक्टोरिया फ़ातमा फ़िल्म्स' कर लिया.

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'बुलबुल-ए-पेरिस्तान' फ़िल्म से मिली कामयाबी 

फ़िल्म कंपनी बनाने के बाद फ़ातमा बेगम ने 3 साल के अंतराल में लगातार 7 फ़िल्मों का निर्देशन किया. सन 1926 में आई 'बुलबुल-ए-पेरिस्तान' बेहद सफ़ल रही थी. इसके बाद देवी ऑफ़ लव (1927), हीर रांझा (1928), चन्द्रावली (1928) फ़िल्मों का निर्देशन भी किया. सन 1929 में 'शकुंतला', 'मिलान', 'कनकटारा', 'भाग्य की देवी' जैसी फ़िल्मों में बतौर एक्ट्रेस काम भी किया.

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फ़ातमा बेगम के लिए 'बुलबुल-ए-पेरिस्तान' उनके द्वारा निर्देशित सबसे प्रसिद्ध सफ़ल साबित हुई. इसी फ़िल्म से उनके करियर को एक नई पहचान मिली थी. इस फ़िल्म में हॉलीवुड फ़िल्मों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक 'स्पेशल इफ़ेक्ट' का प्रयोग भी किया गया था. ये एक बड़े बजट की फ़िल्म थी. इसमें उनके लाखों रुपये खर्च हो गए थे. उस दौर में 1 लाख रुपये की क़ीमत आज के 10 करोड़ रुपये से अधिक थी. 

फ़ातमा बेगम का बॉलीवुड में बहुमूल्य योगदान  

फ़ातमा बेगम ने ख़ुद को केवल निर्देशन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने कई फ़िल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी. निर्देशन के साथ ही उन्होंने अभिनय में भी एक ऊंचा मुकाम हासिल किया. फ़ातमा ने अपने बैनर के अलावा 'कोहिनूर' और 'इंपीरियल स्टूडियो' के बैनर तले भी कुछ फ़िल्मों का निर्देशन किया था. इस दौरान उनके निर्देशिन में बनी फ़िल्मों को दर्शकों के बीच काफ़ी पसंद किया और ये भारतीय सिनेमा जगत की सबसे सफ़ल फ़िल्में भी रहीं.

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बॉलीवुड को अलविदा कहने के बाद फ़ातमा बेग़म की विरासत को उनकी 3 बेटियों जुबैदा, सुल्ताना और शहजादी ने संभाला. ये तीनों भारतीय सिनेमा जगत में अपनी मां की तरह ही अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफ़ल रही थीं. इनमें से जुबैदा बॉलीवुड की मूक फ़िल्मों की सुपर स्टार के तौर पर मशहूर हुई थीं. जुबैदा ने 1931 में भारतीय सिनेमा की पहली साउंड (बोलती) फ़िल्म 'आलम आरा' में भी काम किया था. 

आख़िरकार सन 1983 में फ़ातमा बेग़म ने 90 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.