ज़िन्दगी करीब से देखने में एक त्रासदी है , लेकिन दूर से देखने पर एक कॉमेडी…

-चार्ली चैप्लिन

चार्ली चैप्लिन की इस बात में इतनी गंभीरता छिपी है, जिसे हर कोई समझ नहीं सकता.

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वो कहते हैं न कि दिल जब उदास हो, दिल जब तन्हा हो, दिल जब फूट-फूट कर रोने को चाहे तो कुछ अच्छा नहीं लगता. निराशा के परे एक खिड़की होती है जहां आशा का चिराग़ महफ़ूज़ होता है, बस नज़र नहीं आता वो निराशा के तूफान में. गर कोई ऐसे मौक़े पर अपने दुख को किनारे रख आपके आंसूओं की परवाह कर आपको उस चिराग़ के पास ले जाये तो कितना अच्छा लगे. जब कोई रुसवाई के वक़्त आपको अपने गले लगा ले तो भी तन्हाई कहीं दूर चली जाती है. चार्ली चैपलिन एक ऐसी ही हंसी है जो रुसवाई को गले लगाकर कम कर देती है.

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चार्ली चैपलिन को मात्र एक हास्यकार समझना हमारी भूल होगी, वो हंसी के उस दौर से बहुत आगे निकल चुके थे जहां हंसी सिर्फ़ खुशी का सामान बनकर रह जाती है. हंसी की सतह को खोदकर चैपलिन ने सारे ग़मों को खरीद लिया था. फिर उन सारे ग़मों को अपने ग़मों के साथ मिलाकर बड़ा किया. उन ग़मों को उसने अभिनय करना सिखाया, वही ग़म चार्ली के अभिनय के माध्यम से खुशियां बांटने लगे. 

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अपने ग़मों का मज़ाक बना कर लोगों को हंसाया

16 अप्रैल 1889 को पैदा होने वाले चार्ली चैपलिन का असली नाम ‘सर चार्ल्स स्पेन्सर चैप्लिन’ था. माता-पिता दोनों ही कलाकार थे, इसीलिए इनका रूझान भी उस ओर ही था. चार्ली जब तीन साल के थे, तो माता-पिता ने अपने रस्ते अलग कर लिए थे. अपने माता-पिता से ही इन्होंने गाना सीखा. अकसर एक वाक़िआत का ज़िक्र किया जाता है कि एक बार स्टेज़ में चार्ली की मां शो कर रही थी, मां की तबियत खराब हुई तो पांच वर्ष के चार्ली ने स्टेज में समां बांध दिया. वो स्टेज़ पर कोई अभिनय नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने दुखों का इज़हार कर रहे थे, लोग हंसते गये चार्ली रोता गया. इसीलिए चार्ली ने अपने अभिनय में ग़म ही खरीदे ताकि ख़ुशियों का व्यापार कर सके.

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चार्ली का जन्म हालांकि लंदन में हुआ था लेकिन थिएटर में रुचि होने के चलते उन्होंने कई देशों को मात्र 15 साल की उम्र में ही घूम लिया था. 19 साल की उम्र में उन्हें एक लड़की से एक तरफ़ा मोहब्बत हुई लेकिन जब वहां भी ग़म मिला, तो चार्ली ने उस ग़म को भी अपने ज़हन में सहेज कर रख लिया. चार्ली ने तीन शादियां की थी. ज़िंदगी का एक लंबा रास्ता मुफ़लिसी के आशियाने में गुज़रा. बाद में चार्ली अमेरिकी सिनेमा और क्लासिकल हॉलीवुड का जाना-माना नाम बन गये. दोनों विश्व युद्ध चार्ली के सामने ही हुए, एक का दर्द तो उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में भी उतारा. 

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चालिस बरस तक लगातार उन्होंने थिएटर किया. उनकी मनोरंजक छवि के चर्चे उनके प्रशंसक उनका रूप धरे ढो रहे थे. अपनी आत्मकथा (मेरा जीवन: चार्ली चैप्लिन) में वो ज़िक्र करते हैं कि ‘जीवन का सबसे ख़ुशनुमा पल अमेरिका जाकर बसना था’ लेकिन धीरे-धीरे खुली हवा की तलाश और उबलते सवालों ने उन्हें उम्र के छठे दशक में स्विटज़रलैंड आकर रहने पर मजबूर कर दिया. 

यहां हम उनके जीवन से जुड़े कुछ अनसुने किस्सों का ज़िक्र करने जा रहे हैं. 

एक प्रतियोगिता में तीसरा स्थान

मोन्टे कार्लो में चार्ली चैपलिन जैसा दिखने की प्रतियोगिता चल रही थी. चार्ली चैपलिन सच में वहां पहुंच गये और उन्हें उस प्रतियोगिता में तीसरा स्थान मिला.

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‘द ग्रेट डिक्टेटर’ से शुरू हुआ सवाल

जब चार्ली ने अपनी फ़िल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ पर काम करना शुरू किया तो अडोल्फ़ हिटलर का मज़ाक उड़ाती इस फ़िल्म की सफ़लता को लेकर उनके मन में गंभीर संशय थे.

वो अपने दोस्तों से लगातार पूछा करते थे, 

सही बताना, मुझे इस फ़िल्म को बनाना चाहिये या नहीं? मान लिया हिटलर को कुछ हो गया तो? या जाने कैसे हालात बनें?

चैपलिन के प्रिय मित्र डगलस फ़ेयरबैंक्स ने चार्ली से कहा, 

तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं है चार्ली! यह मानव इतिहास की सबसे चमत्कारिक ट्रिक होने जा रही है कि दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक और दुनिया का सबसे बड़ा मसखरा, दोनों एक जैसे दिखें. अब अगर मगर बंद करो और फ़िल्म में जुट जाओ.

चार्ली चैपलिन ने बचपन में नाई की दुकान पर भी काम किया था लेकिन अपनी आत्मकथा में उन्होंने इस बात का कोई ज़िक्र नहीं किया. इस काम से उन्हें ये फ़ायदा हुआ कि वो अपनी महान फ़िल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में यहूदी नाई का चरित्र बख़ूबी निभा सके. 

1972 में उन्हें उनके अभिनय और संगीत के लिए ऑस्कर पुरस्कार से भी नवाजा गया. 1952 में आई फ़िल्म ‘लाइमलाइट’ के लिए उन्हें ऑस्कर मिला था. जहां 25 दिसंबर 1977 के दिन पूरी दुनिया खुशियां मनाती है, वहीं ये हंसी (चार्ली चैप्लिन) हमारे जहान से परे अपनी दुनिया में चली गई. 

आख़िर में बस यही कहेंगे कि चार्ली चैपलिन एक ऐसी बेबाक हंसी थे, जो रोती ज़िंदगियों को भी मुस्कान दे दे.