जब भी भारत की सबसे बेहतरीन फ़िल्म की बात होगी, सबसे पहले 'मदर इंडिया' का नाम लिया जाएगा. आज की पीढ़ी ने शायद ये फ़िल्म न देखी हो लेकिन नाम ज़रूर सुना होगा. आज भी इस मदर इंडिया की मिसालें दी जाती हैं. आज के निर्देशकों के लिए ये फ़िल्म रेफ़रेंस प्वाइंट बन चुकी है.

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1957 में रिलीज़ हुई मदर इंडिया ने आंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत हासिल की थी. अवार्डस, बॉक्स ऑफ़िस और आलोचक इसके आगे बिछ गए थे. 1958 में भारत की ओर से इसे ऑस्कर के लिए भी भेजा गया था वहां ये फ़िल्म थोड़ी बदकिस्मत रही और मात्र एक वोट से Academy Award for Best Foreign Language Film श्रेणी में चूक गई.

मदर इंडिया देख चुके लोगों को भी ये जानकारी नहीं होती है कि ये फ़िल्म दरअसल, 1940 में रिलीज़ हुई औरत फ़िल्म की रीमेक है. दोनों फ़िल्मों के निर्देशक मेहबूब ख़ान ही हैं.

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मदर इंडिया अपने समय की सबसे महंगी और सफ़ल थी. तब इसको बनाने का बजट 40 लाख रखा गया था, जो बढ़ कर 60 लाख के पार चला गया था. आज के समय से अगर तुलना करें तब भी ये फ़िल्म सबसे महंगी और सफ़ल फ़िल्मों में शुमार होगी.

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लोगों ने मदर इंडिया की कहानी में आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर देखी. साथ ही साथ एक सशक्त महिला के किरदार ने लोगों का दिल जीत लिया. हालांकि नैतिक स्टिरियोटाइप के इस्तेमाल के लिए फ़िल्म की आलोचना भी की जाती है.

फ़िल्म के बारे में एक रोचक तथ्य ये भी है कि इसकी शूटिंग स्क्रिप्ट फ़ाइनल हो जाने से पहले ही शुरु हो चुकी थी. 1955 में उत्तरप्रदेश में बाढ़ आई थी, फ़िल्म के लिए बाढ़ के दृश्य को फ़िल्माने के लिए एक टीम वहां भेज दी गई थी.

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फ़िल्म के निर्देशक इस फ़िल्म के फ़ेमस किरदार बिरजु के लिए हॉलीवुड में काम कर रहे भारतीय मूल के कलाकार Sabu Dastagir को कास्ट करना चाहते थे लेकिन पेपर वर्क की वजह से बात नहीं बनी. मशहूर अभिनेता दिलिप कुमार भी बिरजु के किरदार को निभाने की इच्छा ज़ाहिर कर चुके थे, मेहबूब ख़ान ने हामी भी भर दी थी लेकिन मुख्य अभिनेत्री नरगिस ने निर्देशक को ध्यान दिलाया कि दर्शकों ने दिलिप कुमार के साथ उनकी रोमैंटिक जोड़ी देखी और पसंद की है, मां-बेटे के किरदार में दोनों अच्छे नहीं लगेंगे.

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बाद में बिरजु के किरदार के लिए एक फ़िल्म पुराने सुनिल दत्त को तय किया गया. घटनाएं ऐसे घटी की नरगिस और सुनिल दत्त को फ़िल्म के निर्माण के दौरान ही प्यार हो गया. निर्देशक महबूब खान ने दोनों को ये बात फ़िल्म रिलीज़ होने तक छुपा कर रखने के लिए कही क्योंकि इससे फ़िल्म पर बुरा असर पड़ता.

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मदर इंडिया के रिलीज़ ने सुनिल दत्त, राजकुमार और राजेंद्र कुमार को स्टार की श्रेणी में ला खड़ा किया. नरगिस पहले से ही एक बड़ी स्टार थीं.

जब मदर इंडिया दिल्ली में रिलीज़ हुई थी तब एक ख़ास प्रेमियम शो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लिए भी रखा गया था.

फ़िल्म समीक्षकों का मानना है कि इस फ़िल्म के सफ़ल होने की कई वजहें हैं. एक क्रेडिट नौशाद के संगीत को भी जाता है, नौशाद ने पहली बार भारतीय सिनेमा में वेस्टर्न ऑरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया था.

इसका निर्देशन अंतरराष्ट्रीय स्तर का था, इसके लिए महबूब ख़ान के गुरु Cecil B. DeMille ने भी उनकी तारीफ़ की थी. फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्डस की झड़ी ये साबित करती है कि इसपर कितनी मेहनत की गई थी.

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एक और दिलचस्प किस्सा जुड़ा है इस फ़िल्म के साथ, बिरजु के बचपन का किरदार निभाने वाले मास्टर साजिद ख़ान के बारे में. जब फ़िल्म का काम शुरू हो चुका था तब साजिद की उम्र महज़ चार साल थी और वो मुंबई की बस्ती में रहने वाला बिन मां-बाप का बच्चा था. लोगों को फ़िल्म में साजिद का काम ख़ास तौर पर पसंद आया. बाद में निर्देशक महबूब खान ने साजिद को गोद ले लिया.