1913 में दादासाहेब फ़ाल्के ने अपनी पहली मूक (Silent) फ़ीचर फ़िल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई. उस समय शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि वो दुनिया के सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव रख रहे हैं. इधर हिंदुस्तान में आज़ादी पर मंथन पर चल रहा था और उधर साइलेंट मूवीज और टॉकीज़ का युग.

आज़ादी से पहले फ़िल्म उद्योग ने देश को कई सुपरहिट फ़िल्में दीं. इसके साथ ही कुछ महान कलाकारों से भी मिलाया. देश के संघर्ष के दिनों के वो कलाकार जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक नई राह दी. अपने अभिनय और कौशल से उन्होंने सिनेमा देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

चलिये धर्म और जेंडर की बाधा तोड़ अभिनय की दुनिया में इतिहास रचने वाले इन महान कलाकारों से मिलते हैं.  

1. पृथ्वी राजकपूर  

पृथ्वी राजकपूर वकील बनना चाहते थे, पर क़िस्मत ने उन्हें एक्टर बना दिया. उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत Peshawar और Lyllapur सिनेमाघरों से हुई थी. इसके बाद उन्होंने अपनी मौसी से उधार पैसे लेकर बॉम्बे में क़दम रखा. शुरुआत में उन्हें छोटे-मोटे रोल मिले, पर उनकी मेहनत जारी थी. फ़िल्म Sher-e-Arab में उन्हें लीड रोल मिला और उन्होंने अपना हुनर दिखा दिया.  

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2. रूबी मेयर 

अभिनय की दुनिया में आने से पहले रूबी मेयर एक टेलीफ़ोन ऑपरेटर के तौर पर काम करती थीं. रूबी मेयर काफ़ी ख़ूबसूरत थीं और 1925 में उन्हें ‘Veer Bala’ के लिये अप्रोच किया गया. फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई और फ़िल्म इंडस्ट्री को रातों-रात सुपरस्टार अभिनेत्री सुलोचना मिली. 

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3. सोहराब मोदी 

सोहराब मोदी बॉलीवुड के महान अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थे. जिन्होंने आज़ादी से पहले फ़िल्म जगत को ‘सिकंदर’ (1941), ‘जेलर’ (1938), ‘पुकार’ (1939) जैसी बेहतरीन फ़िल्म्स दीं.  

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4. देविका रानी चौधरी 

देविका रानी चौधरी को हिंदी सिनेमा की First Lady के रूप में भी जानते हैं. जिन्होंने अभिनय में कुछ अलग करने का साहस किया. अभिनय के साथ-साथ वो प्रोडक्शन में आने वाली भी पहली महिला थीं. फ़िल्म में हिमांशु राय के साथ उनके Kiss सीन ने सबको चौंका दिया था.  

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5. अशोक कुमार  

महान कलाकार के बारे में किसी को परिचय देने की ज़रूरत नहीं है. अशोक कुमार के पिता चाहते थे कि वो वकील बनें, लेकिन उन्हें टेक्निकल चीज़ों में ज़्यादा दिलचस्पी थी. क़िस्मत से उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ में लैब असिस्टेंट की नौकरी मिल गईं. यहीं से उन्हें उनका फ़िल्मी ब्रेक भी मिला. बस फिर क्या था हिंदी सिनेमा को एक बेहतरीन स्टार मिल गया.  

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6. शांता आप्टे 

शांता आप्टे बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों में से थीं, जिन्होंने कई भाषाओं और क्षेत्रों में काम किया था. वो एक मराठी और हिंदी फ़िल्म अभिनेत्री थीं. शांता आप्टे ने अभिनय की शुरुआत मराठी फ़िल्म ‘श्यामसुंदर’ (1932) से राधा के रूप में की थी. अपने करियर में उन्होंने हिंदी सिनेमा को बहुत सी बेहतरीन फ़िल्में दीं और Ram Bhakt Vibhishan उनकी अंतिम फ़िल्म साबित हुई.  

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7. दुर्गा खोटे  

दुर्गा खोटे एक मराठी/हिंदी फ़िल्म अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक नया रूप देने में अहम योगदान दिया. कहते हैं कि दुर्गा खोटे जब फ़िल्म इंडस्ट्री में आई थीं. उस समय अच्छे घर की लड़कियां फ़िल्म में काम नहीं करतीं थी. पर दुर्गा खोटे ने हिंदी सिनेमा में काम किया और उसे बेहतर भी बनाया.  

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8. नसीम बानो 

नसीम बानो एक अच्छे और अमीर मुस्लिम परिवार से आती थीं. नसीम बानो मां और अभिनेत्री दोनों थीं, वो अपनी बेटी को डॉक्टर बनते हुए देखना चाहती थीं. हालांकि, ऐसा हुआ नहीं. अभिनेत्री ने अपनी मां के विपरीत जाकर ‘Khoon Ka Khoon’ से अभिनय की शुरुआत की. कहा जाता है कि पहली फ़िल्म के दौरान वो स्कूल में पढ़ती थीं.  kuch missing hai फ़िल्म रिलीज़ होते ही स्कूल वालों ने उन्हें स्कूल से निकलने को कहा और बानो ने उसे स्वीकार कर एक्टिंग को अपना लिया.  

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ये आज़ादी से पहले के वो सुपरस्टार हैं. जिन्होंने कई ग़लत सामाजिक धारणाओं को तोड़ हिंदी सिनेमा को बेहतर बनाने का प्रयास किया. इस तरह से भारतीय फ़िल्म जगत दुनियाभर में नाम रौशन हुआ.