कमल हासन (Kamal Haasan) बॉलीवुड के उन चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं, जो अलग-अलग तरह के किरदार निभाने के लिए जाने जाते हैं. सही मायने में अगर किसी बॉलीवुड एक्टर को मिस्टर परफेक्शनिस्ट का ख़िताब दिया जाए तो वो कमल हासन ही होंगे. कमल हासन देश के उन कुछ चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं जिन्हें सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पहचान मिली. उन्होंने अपने करियर में कई बेहतरीन फ़िल्में की हैं, लेकिन आज हम आपको उनकी एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बताने जा रहे हैं जिसमें कमल हासन ने बिना कुछ बोले भी सब कुछ कह दिया था. 

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साल 1987 में कमल हासन की एक बेहतरीन फ़िल्म आई थी, जिसका नाम पुष्पक विमान था. इस फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से कन्नड़ भाषा की फ़िल्म के तौर पर पास कराया गया था. हिंदी में इसे ‘पुष्पक’, तमिल में ‘पेसुम पदम’, तेलुगू में ‘’पुष्पका विमानमु’ और मलायलम में ‘पुष्पकविमानम’ नाम से रिलीज़ किया गया था. ये सब उस फिल्म के साथ हुआ है जिसमें कोई संवाद ही नहीं है.

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इस फ़िल्म में कमल हासन, अमाला और टीनू आनंद मुख्य भूमिकाओं में नज़र आये थे. ये एक साइलेंट फ़िल्म थी. इस फ़िल्म के बारे में कहा जाता है कि भारत में अब तक इस जैसी कोई दूसरी फ़िल्म नहीं बनी. इस डार्क कॉमेडी फ़िल्म में एक भी डायलॉग नहीं था, लेकिन कमल हासन ने अपने बेहतरीन एक्सप्रेशन इसे भारतीय सिनेमा की एक कल्ट फ़िल्म बना दी. अगर आपने आज तक ये फ़िल्म देखी तो फिर क्या देखा! 

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फ़िल्म में पैसा लगाने के लिए नहीं था कोई राज़ी

इस फ़िल्म की कहानी सिंगीतम श्रीनिवास राव ने लिखी थी. कमल हासन जब फ़िल्म करने के लिए तैयार हुए तो निर्देशक श्रीनिवास राव के सामने पहली समस्या आई कि इसमें पैसा कौन लगाएगा? उस वक्त 35 लाख रुपये की लागत से बनी इस फ़िल्म में कोई भी पैसा लगाने को तैयार नहीं था. इसके बाद राव ने ख़ुद ही इसका निर्माण करने का फैसला कर किया. ये बात जब कन्नड़ अभिनेता श्रृंगार नागराज को पता चली तो उन्होंने राव के फ़ैसले की तारीफ़ की और ख़ुद भी फ़िल्म में पैसा लगाया. 

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बेहतरीन स्क्रिप्ट ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड  

‘पुष्पक’ की स्क्रिप्ट इतनी बेहतरीन थी कि शुरू से लेकर अंत तक ये फ़िल्म सभी को बांध पाने में कामयाब रही. बिना डायलॉग के सिर्फ एक्सप्रेशन के बलबूते पर ऐसा कर पाना बेहद मुश्किल होता है. कमल हासन, अमाला और टीनू आनंद ने अपनी बेहतरीन एक्टिंग से कमाल ही कर दिया. यही कारण था कि इस फ़िल्म को 1987 में ‘बेस्ट पॉपुलर फ़िल्म’ का ‘नेशनल अवॉर्ड’ भी दिया गया था.  

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क्या थी फ़िल्म की कहानी? 

फ़िल्म ‘पुष्पक’ बेरोज़गारी से जूझ रहे एक युवा के सपनों की कहानी है, जो है तो बेरोज़गार लेकिन रोज़गार ढूंढ़ने के लिए मेहनत नहीं करना चाहता. वो ख़ुद को बेहद ओवरस्मार्ट भी समझता है. एक दिन इसे ग़लती से एक बड़े होटल के कमरे की चाभी मिल जाती है. इसके बाद ये वहां पर कुछ दिनों के लिए आलीशान जीवन जीता है. मगर जल्द ही उसे पता चल जाता है कि उसने अपने जीवन में ख़ुद कुछ भी नहीं किया और वो दूसरों के पैसे पर अइय्याशी कर रहा है. 

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फ़िल्म का हर एक सीन देता है मैसेज 

इस दौरान उसे एक लड़की से प्यार भी हो जाता है, लेकिन वो इसे मिल नहीं पाती. धीरे-धीरे इसे इस बात का अंदाज़ा हो जाता है कि जब तक वो अपने जीवन को लेकर गंभीर नहीं होगा उसका जीवन व्यर्थ है. इस फ़िल्म का हर एक सीन इतना शानदार है कि उन्हें अगर ध्यान से देखेंगे तो हर सीन एक नया मैसेज देता है. बेरोज़गारी को लेकर फ़िल्म में बहुत सारे तंज हैं. ख़ासकर भिखारी के पास एक बेरोज़गार स्नातक से ज़्यादा पैसे होने वाला सीन दिल को कचोटता है. 

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ये कहानी इस सबक की भी है कि रुपया पैसा कितना भी आ जाए, लेकिन शांति मेहनत की कमाई से ही मिलती है. इस फ़िल्म में एक ईमानदारी ये दिखती है कि उस वक्त तक लोगों को नौकरियां बिना सोर्स सिफ़ारिश के मिल जाती थीं. भारतीय सिनेमा के दिग्गज सत्यजीत रे ने ख़ुद ‘पुष्पक’ फ़िल्म की तारीफ़ की थी.

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