फ़िल्म इंडस्ट्री में एक दौर ऐसा था जब मां और सासू मां के किरदार बड़े फ़ेमस हुए. मां के रोल के लिए निरूपा रॉय और खडूस सास के लिए ललिता पवार को याद किया जाता है. इन्होंने अपने-अपने किरदारों को हमेशा-हमेशा के लिए जीवित कर दिया है अपनी फ़िल्मों में. ख़ैर, आज बात लोगों की फे़ेवरेट मां की नहीं, बल्कि सासू मां की होगी यानी ललिता पवार की करेंगे. 

एक दौर ऐसा था जब क्रूर सास के किरदार को निभाने के लिए डायरेक्टर्स की पहली पसंद ललिता पवार ही हुआ करती थीं. फिर इन्होंने रामायण में मंथरा का रोल ऐसे निभाया था कि लोग उन्हें सच में मंथरा कहने लगे थे. कुछ भी हो ललिता पवार थी बहुत ही उम्दा एक्ट्रेस. उन्होंने अपने करियर में 700 से अधिक फ़िल्मों में काम किया था.

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ललिता पवार जब 12 साल की थीं तभी उन्होंने फ़िल्मों में काम करना शुरू कर दिया था. 1928 में रिलीज़ हुई ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ उनकी पहली फ़िल्म थी. उनका सपना था कि वो बॉलीवुड की टॉप की एक्ट्रेस बनें. आज उनसे जुड़ा एक दिलचस्प क़िस्सा हम आपके लिए आए हैं. ललिता पवार को काफ़ी फ़िल्मों में काम करने के बाद एक बार जाति प्रमाण पत्र बनवाना पड़ा था. वो क्यों? चलिए जानते हैं.

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ललिता पवार अपने ज़माने की बोल्ड एक्ट्रेस भी थीं. उन्होंने उस दौर में बिकनी पहन फ़ोटोशूट करवाए, मर्दों की तरह फ़िल्मों में स्टंट किए और यहां तक कि एक फ़िल्म में किसिंग सीन भी किया. ये उस ज़माने के हिसाब से कहीं आगे था. यानी वो अपने किरदारों के साथ एक्सपेरिमेंट करने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं.

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ऐसे ही 1941 में डायरेक्टर मास्टर विनायक ने मराठी के मशहूर उपन्यासकार विष्णु सखाराम खांडेकर की कहानी पर फ़िल्म बनाई. इसका ना था ‘अमृत’ जिसमें ललिता पवार ने मोची का किरदार निभाया था. कहते हैं कि उनका रोल इतना पॉपुलर हुआ कि लोग उन्हें दलित समझने लगे थे. यहां तक कि उनसे छुआछूत का व्यवहार करने लगे.

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ऐसी कठिन परिस्थितियों से बचने के लिए ललिता पवार को जाति प्रमाण पत्र बनवाना पड़ा. ललिता पवार एक प्रोड्यूसर भी थीं. चलते-चलते आपको बता दें कि उन्होंने 2 फ़िल्में प्रोड्यूस की थी ‘दुनिया क्या है’ और ‘कैलाश’. बॉलीवुड स्टार प्रियंका चोपड़ा और अनुष्का शर्मा से कहीं पहले, जिनके प्रोड्यूसर बनने को लेकर खूब चर्चा होती है.