‘5 घंटे लंबी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में रामाधीर सिंह का किरदार सबसे प्रोग्रेसिव और चुनौतीपूर्ण किरदारों में से था. ज़ाहिर है, इस किरदार के लिए हमें किसी मंझे हुए और अनुभवी एक्टर की तलाश थी, लेकिन जब फ़िल्म के कास्टिंग डायरेक्टर ने तिग्मांशु का नाम सुझाया, तो मुझे ये बात जंच गई. दरअसल तिग्मांशु ने मुझे अपनी एक फ़िल्म ‘शागिर्द’ में एक रोल दिया था. उस फ़िल्म में मुझे तिग्मांशु की Intensity देखकर मन ही मन लगता था कि इस शख़्स को निर्देशक नहीं बल्कि एक्टर होना चाहिए.

अनुराग कश्यप ने ये शब्द तिग्मांशु धूलिया के लिए कहे थे. वहीं तिग्मांशु जो गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में माफ़िया रामाधीर सिंह के तौर पर नज़र आए थे. वही जो हासिल और पान सिंह तोमर जैसी कल्ट फ़िल्में बॉलीवुड को दे चुके हैं. जो मानते हैं कि वे ‘कुछ कुछ होता है’ जैसी फ़िल्में बना ही नहीं सकते हैं.

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तिग्मांशु एक्टिंग से ज़्यादा निर्देशन को तरजीह देते हैं. वे खुद कहते हैं कि अगर कोई दोस्त किसी प्रोजेक्ट के लिए मुझे नौकरी देना चाहे, या कोई मुझे एक्टिंग के लिए अच्छी खासी रकम दे, तभी मैं एक्टिंग करना पसंद करुंगा, क्योंकि मैं एक्टिंग को नहीं, बल्कि निर्देशन को गंभीरता से लेता हूं.

तिग्मांशु का संस्कृत में मतलब होता है एक ऐसा व्यक्ति जिसकी तीक्ष्ण निगाहें हो और जो आसानी से माहौल को Observe कर सके. 1967 में इलाहाबाद के जज और संस्कृत प्रोफ़ेसर मां के घर में पैदा हुए तिग्मांशु घर में सबसे छोटे थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मार्डन हिस्ट्री, इकोनॉमिक्स और अंग्रेज़ी में पास आउट होने वाले तिग्मांशु स्टूडेंट राजनीति में भी एक्टिव रहे. उनके घर पर हमेशा से एक लिबरल माहौल रहा.  1986 में ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) जॉइन किया. 

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एक छोटे से शहर में पले-बढ़े धूलिया के लिए एनएसडी का माहौल कल्चर शॉक जैसा था. अपने नाम की तरह ही संवदेनशील और जिज्ञासु तिग्मांशु को यहां आकर चीज़ों को देखने का नया नज़रिया मिला. अपने नाम ही की तरह तिग्मांशु यहां के माहौल को समझने की जद्दोजहद में जुट गए.  एनएसडी की मशहूर लाइब्रेरी की किताबों ने उन्हें विश्व सिनेमा और ज़िंदगी के नए तजुर्बो से परिचित कराया. 

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शेखर कपूर की फ़िल्म बैडिंट क्वीन में कास्टिंग निर्देशक के तौर पर अपनी शुरुआत करने वाले तिग्मांशु की पहली फ़िल्म हासिल 2003 में आई थी. स्टूडेंट्स राजनीति पर आधारित फ़िल्म ‘हासिल’ आज कल्ट कैटेगिरी हासिल कर चुकी है. इसके बाद आई फ़िल्म ‘चरस’ और ‘शागिर्द’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में भी उन्होंने छोटे शहरों की पृष्ठभूमि और रियलिस्टिक सिनेमा के नए कलेवर से लोगों को अवगत कराया.

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अनुराग कश्यप और दिबाकर बनर्जी जैसे निर्देशकों की तरह ही वे रियलिस्टिक फ़िल्मों के प्रयोगधर्मी डायरेक्टर के तौर पर अपनी पहचान बनाने की जुगत में थे और पान सिंह तोमर ने उनके लिए राहें आसान कर दी. कई फ़िल्मों के औसत बिज़नेस के बाद पान सिंह तोमर उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई. एक टैलेटेंड एथलीट से बागी बनने की कहानी को धूलिया ने जब अपना टच दिया तो फ़िल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफ़र तय किया. इस फ़िल्म के लिए तिग्मांशु ने डेढ़ साल तक बीहड़ों और जंगलों पर रिसर्च की थी.

तिग्मांशु मॉर्डन डे फ़िल्ममेकिंग के सबसे दिलचस्प निर्देशकों में से एक हैं. उनकी फ़िल्मों का देसीपन एक यथार्थ टच लिए हुए है और उनकी स्क्रिप्ट्स से हमेशा एक नए तरह के सिनेमा की उम्मीद की जा सकती है. हालांकि जिस एक बात से लोग निराश हो सकते है, वो है उनकी एक्टिंग के प्रति नीरसता. वे तो यहां तक कहते हैं कि वे एक बेहद लिमिटेड कलाकार है और गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में निभाया उनका केरेक्टर कोई भी अनुभवी कलाकार आसानी से निभा सकता था.  अपनी एक्टिंग को लेकर विनम्र रहने वाले तिग्मांशु से उम्मीद है कि आने वाले समय में भी वे अपनी आर्टिस्टिक फ़िल्मों से दर्शकों और क्रिटिक्स को बेहतरीन फ़िल्में देते रहेंगे.